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संकल्प विधि:

संकल्प एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है—हृदय अथवा मन में निर्मित धारणा, कार्य करने की गम्भीर प्रतिज्ञा, दृढ़ भावना, निर्णय अथवा प्रबल इच्छाशक्ति।

1. संकल्प की क्रिया:

आचमन करने के पश्चात् पञ्चपात्र से जल लेकर अपने दाहिने हाथ की हथेली को स्वच्छ करें। फिर दाहिने हाथ की हथेली में जल, अक्षत, पुष्प, कुछ द्रव्य (सिक्का) और सुपारी लेकर पूजा सङ्कल्प पाठ करें। पाठ पूर्ण होने पर जल को अपने समक्ष भूमि पर (अथवा किसी पात्र में) छोड़ दें।

2. संकल्प मंत्र:

ॐ तत्सत् अद्यैतस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय–प्रहरार्द्धे श्वेत–वराह–कल्पे
जम्बू–द्वीपे भरत–खण्डे अमुक–प्रदेशे अमुक–पुण्य–क्षेत्रे कलियुगे
कलि–प्रथम–चरणे अमुक–संवत्सरे कार्तिक–मासे कृष्ण–पक्षे
अमावस्या–तिथौ अमुक–वासरे अमुक–गोत्रोत्पन्नो अमुक–नाम–अहं
सपत्नीकस्य सुपुत्रस्य सबान्धवस्य सर्वत्र यशो–विजयादि–लाभार्थं
सर्वारिष्ट–निवृत्ति–पूर्वक–सकल–मनोकामना–सिद्ध्यर्थं
अप्राप्त–लक्ष्मी–प्राप्त्यर्थं प्राप्त–लक्ष्मीं चिर–काल–संरक्षणार्थं
प्रचलित–व्यापार–प्रतिष्ठाने बहु–धन–लाभार्थं श्रीमहा–लक्ष्मी–प्रसन्नार्थं

    यदि नये बही-खाते का पूजन हो:

अमुक–नामकस्य मम व्यापार–प्रतिष्ठानस्य
नूतन–वासना–पूजन–कर्मणः साङ्गता–सिद्ध्यर्थं

 

इतना और जोड़ लेना चाहिये

स्वस्ति–वाचन–कलश–स्थापन–पूर्वकं यथा–सम्पादित–सामग्र्या
गणपति–सूर्यादि–नवग्रह–षोडश–मातृकादि–पूजन–सहितं दीपावल्यां
श्रीगणेश–लक्ष्मी–प्रतिमा–पूजनम् करिष्ये।

संकल्प विधि:

शान्ति-पाठ से देह सभी प्रकार से शुद्ध हो जाती है तथा अकल्याण एवं अशुभता का नाश होता है।

शान्ति पाठ मन्त्र-१

ॐ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।
देवा नो यथा सदमिद्वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे–दिवे॥


मन्त्रार्थ
– हमारे समीप चारों ओर से ऐसे कल्याणकारी विचार आते रहें जो किसी से न प्रभावित हों, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके एवं अज्ञात विषयों को प्रकट करने वाले हों। प्रगति को न बाधित करने वाले तथा सदैव रक्षा में तत्पर देवता प्रतिदिन हमारी वृद्धि के लिये तत्पर रहें।

शान्ति पाठ मन्त्र-२

ॐ देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो निवर्तताम्।
देवानां सख्यमुपसेदिमा वयं देवा न आयुः प्रतिरन्तु जीवसे॥


मन्त्रार्थ
– यजमान की इच्छा रखने वाले देवताओं की कल्याणकारिणी श्रेष्ठ बुद्धि सदा हमारे सम्मुख रहे, देवताओं का दान हमें प्राप्त हो, हम देवताओं की मित्रता प्राप्त करें, देवता हमारी आयु में जीवन के निमित्त वृद्धि करें।

शान्ति पाठ मन्त्र-३

ॐ तान् पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्।
अर्यमणं वरुणं सोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्॥


मन्त्रार्थ
– हम वेदरुप सनातन वाणी के द्वारा अच्युतरुप भग, मित्र, अदिति, प्रजापति, अर्यमण, वरुण, चन्द्रमा एवं अश्विनीकुमारों का आवाहन करते हैं। ऐश्वर्यमयी सरस्वती महावाणी हमें सभी प्रकार का सुख प्रदान करें।

शान्ति पाठ मन्त्र-४

ॐ तन्नो वातो मयो भुवातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः।
तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम्॥


मन्त्रार्थ
– वायुदेवता हमें सुखकारी औषधियाँ प्राप्त करायें। माता पृथ्वी एवं पिता स्वर्ग भी हमें सुखकारी औषधियाँ प्रदान करें। सोम का अभिषव करने वाले सुखदाता ग्रावा उस औषधरुप अदृष्ट को प्रकट करें। हे अश्विनी-कुमारों! आप दोनों सभी के आधार हैं, हमारी प्रार्थना स्वीकार करें।

शान्ति पाठ मन्त्र-५

ॐ तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम्।
पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥


मन्त्रार्थ
– हम स्थावर-जंगम के स्वामी, बुद्धि को सन्तोष प्रदान करने वाले रुद्रदेवता का रक्षा के निमित्त आवाहन करते हैं। वैदिक ज्ञान एवं धन की रक्षा करने वाले, पुत्र आदि के पालक, अविनाशी पुष्टि-कर्ता देवता हमारी वृद्धि एवं कल्याण के निमित्त हों।

शान्ति पाठ मन्त्र-६

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥


मन्त्रार्थ
– महती कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें, जिसको संसार का ज्ञान है तथा जिसका सब पदार्थों में स्मरण है, समस्त प्राणियों के पोषणकर्ता वे पूषा (सूर्य) हमारा कल्याण करें। जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें। वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें।

शान्ति पाठ मन्त्र-७

ॐ पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभं यावानो विदथेषु जग्मयः।
अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह॥


मन्त्रार्थ
– चितकबरे वर्ण के घोड़ों वाले, अदिति माता से उत्पन्न, सभी का कल्याण करने वाले, यज्ञशालाओं में जाने वाले, अग्निरुपी जिह्वा वाले, सर्वज्ञ, सूर्यरुप नेत्र वाले मरुद्गण एवं विश्वेदेव देवता हविरुप अन्न को ग्रहण करने के लिये हमारे इस यज्ञ में पधारें।

शान्ति पाठ मन्त्र-८

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवागं सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥


मन्त्रार्थ
– हे यजमान के रक्षक देवताओं! हम दृढ़ अङ्गों वाले शरीर से पुत्र आदि के साथ मिलकर आपकी स्तुति करते हुये कानों से कल्याणपूर्ण वचनों का श्रवण करें, नेत्रों से कल्याणमयी वस्तुओं का दर्शन करें, देवताओं की उपासना-योग्य आयु को प्राप्त करें।

शान्ति पाठ मन्त्र-९

ॐ शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्राजरसं तनूनां।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मानो मध्यारीरिषतायुर्गन्तोः॥


मन्त्रार्थ
– हे देवताओं! आप सौ वर्ष की आयु-पर्यन्त हमारे समीप रहें, जिस आयु में हमारे शरीर को जरावस्था प्राप्त हो, जिस आयु में हमारे पुत्र पिता अर्थात् पुत्रवान् बन जायें, हमारी उस गमनशील आयु को आप लोग मध्य में खण्डित न होने दें।।

शान्ति पाठ मन्त्र-१०

ॐ अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः।
विश्वेदेवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्॥


मन्त्रार्थ
– अखण्डित पराशक्ति स्वर्ग है, वही अन्तरिक्ष-रुप है, वही पराशक्ति माता-पिता एवं पुत्र भी है। समस्त देवता पराशक्ति के ही स्वरुप हैं, अन्त्यज सहित चारों वर्णों के सभी मनुष्य पराशक्तिमय हैं, जो उत्पन्न हो चुका है तथा जो उत्पन्न होगा, सब पराशक्ति के ही स्वरुप हैं।

शान्ति पाठ मन्त्र-११

पृथिवी शान्तिरन्तरिक्षगं शान्तिर्द्यौश्शान्तिर्दिशः शान्तिरवान्तरदिशाश्शान्तिरग्निश्शान्तिर्वायुः
शान्तिरादित्यश्शान्तिश्चन्द्रमाश्शान्तिर्नक्षत्राणि शान्तिरापश्शान्तिरोषधयश्शान्तिर्वनस्पतयश्शान्तिर्गौः
शान्तिरजा शान्तिरश्वश्शान्तिः पुरुषश्शान्तिर्ब्रह्म शान्तिर्ब्राह्मणश्शान्तिः शान्तिरेव शान्तिश्शान्तिर्मे अस्तु शान्तिः।


मन्त्रार्थ
– पृथ्वीलोक शान्तिदायक हो, अन्तरिक्षलोक शान्तिदायक हो, द्युलोक शान्तिदायक हो। समस्त दिशायें शान्तिदायक हों, अग्नि एवं वायु शान्तिदायक हो। सूर्य, चन्द्र एवं सम्पूर्ण नक्षत्र मण्डल शान्तिदायक हो, जल, औषधियाँ एवं वनस्पतियाँ शान्तिदायक हों। गौ, अश्व आदि पशु शान्तिदायक हों। पुरुष शान्तिदायक हो। ब्रह्म अर्थात् महान परमेश्वर हमें शान्ति प्रदान करने वाले हों।

ब्राह्मण शान्तिदायक हों, उनका दिया हुआ ज्ञान एवं वेद शान्ति प्रदान करने वाले हों। सम्पूर्ण चराचर जगत शान्ति पूर्ण हो अर्थात् सर्वत्र शान्ति ही शान्ति हो। ऐसी शान्ति मुझे प्राप्त हो तथा उसमें सदा वृद्धि ही होती रहे। अभिप्राय यह है कि सृष्टि का कण-कण हमें शान्ति प्रदान करने वाला हो। समस्त पर्यावरण ही सुखद व शान्तिप्रद हो।

मङ्गल पाठ के मन्त्र

शान्ति-पाठ से देह सभी प्रकार से शुद्ध हो जाती है तथा अकल्याण एवं अशुभता का नाश होता है।

मङ्गल पाठ मन्त्र-१

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-२

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-३

विद्यारम्भे विवाहे च विदेशगमने तथा।
संग्रामे सङ्कटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-४

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-५

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके!
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि! नमोऽस्तु ते॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-६

सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम्।
येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनो हरिः॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-७

तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव।
विद्याबलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपतेरंघ्रियुगं स्मरामि॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-८

लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-९

विनायकं गुरुं भानुं ब्रह्मा–विष्णु–महेश्वरान्।
सरस्वतीं प्रणम्यादौ सर्व–कार्यार्थ–सिद्धये॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-१०

अभीप्सितार्थ–सिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः।
सर्व–विघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतये नमः॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-११

सर्वेष्वारब्ध–कार्येषु त्रयस्त्रि–भुवनेश्वराः।
देवाः दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशान–जनार्दनाः॥

कलश स्थापना विधि

पूजा स्थल पर मिट्टी की ढेरी पर सप्तधान्य रखें और उस पर जल, गंगाजल, सिक्का व सुपारी युक्त कलश स्थापित करें। कलश के मुख पर पंचपल्लव (आम के पत्ते) रखकर, नारियल को लाल वस्त्र में लपेटकर उस पर प्रतिष्ठित करें।

कलश के नीचे की भूमि को हाथ से स्पर्श करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-१

ॐ भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्व–धाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री।
पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृ ह पृथिवीं मा हि सीः॥

कलश स्थापना के स्थान पर मिट्टी तथा जौ डालें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-२

ॐ धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणायत्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा।
दीर्घामनु–प्रसितिमायुषे द्यां देवो वः सविता हिरण्य–पाणिः।
प्रति–गृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि॥

कलश को सावधानीपूर्वक उठाकर उसी स्थान पर स्थापित करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-३

ॐ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्ति्वन्दवः।
पुनरूर्ज्जा निवर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरु–धारा पयस्वती पुनर्मा विशताद् रयिः॥

कलश में जल अर्पित करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-४

ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भ–सर्ज्जनीस्थो।
वरुणस्य ऋत–सदन्यसि वरुणस्य ऋत–सदनमसि वरुणस्य ऋत–सदनमासीद॥

कलश के गले में लाल वस्त्र अथवा मोली लपेटें तथा निम्नलिखित मन्त्र उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-५

ॐ वसोः पवित्रमसि शत–धारं वसोः पवित्रमसि सहस्र–धारम्।
देवस्त्वा सविता पुनातु वसोः पवित्रेण शत–धारेण सुप्वा काम–धुक्षः॥

कलश में सुपारी डालें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-६

ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः।
बृहस्पति–प्रसूतास्ता नो मुंचंत्वं हसः॥

कलश में एक रुपये का सिक्का डालते हुये निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-७

ॐ हिरण्य–गर्भः सम–वर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥

गन्ध, रोली आदि अर्पित करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-८

ॐ गन्ध–द्वारां दुराधर्षां नित्य–पुष्टां करीषिणीं।
ईश्वरीगं सर्व–भूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥

हल्दी सहित सभी औषधियाँ कलश में डाल दें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-९

ॐ या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा।
मनैनु बभ्रूणा मह शतं धामानि सप्त च॥

कलश में सात प्रकार की मिट्टी डालें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-१०

ॐ स्योना पृथिवि! नो भवान्नृक्षरा निवेशिनी।
यच्छा नः शर्म स–प्रथाः॥

कलश पर दूर्वा अर्पित करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-११

ॐ काण्डात् काण्डात् प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि।
एवानो दूर्वे! प्रतनु सहस्रेण शतेन च॥

कलश पर आम, बरगद, पीपल अथवा गूलर के पत्ते अर्पित करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-११

ॐ अश्वत्थे वो निषदनम्पर्णे वो वसतिष्कृत।
गोभाज इत्किलासथ यत्स नवथ पूरुषम्॥

कलश पर कुशा अर्पित करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-११

ॐ पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः।
तस्य ते पवित्र–पते पवित्र–पूतस्य यत् कामः पुनेतच्छकेयम्॥

जौ अथवा चावल से भरा बर्तन कलश पर रखें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-११

ॐ पूर्णादर्वि परापत सु–पूर्णा पुनरापत।
वस्नेव विक्रीणा वहा इष मूर्ज्ज शत–क्रतो॥

अक्षत अर्पित करते हुये वरुण देव की स्थापना करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-११

ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं,
तनो त्वरिष्टं यज्ञ समिमं दधातु।
विश्वे–देवा स इह मादयन्ताम् ॐ प्रतिष्ठ॥

आवाहन मुद्रा, आर्थत् दोनों हथेलियों को जोड़कर तथा दोनों अँगूठों को अन्दर की ओर मोड़कर प्रदर्शित करते हुये वरुण देव के आवाहन हेतु निम्नलिखित मन्त्र का जाप करना चाहिये।

कलश स्थापना आवाहन

ॐ भूर्भुवः स्वः वरुण! इहागच्छ, इह तिष्ठ, मम पूजां गृहाण।

निम्नलिखित मन्त्रों का जाप करते हुये चन्दन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से श्री वरुण देव का पूजन करें।

कलश दशोपचार पूजन मन्त्र

ॐ वरुणाय नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
ॐ वरुणाय नमः शिरसि अर्घ्यं समर्पयामि।
ॐ वरुणाय नमः गन्धाक्षतं समर्पयामि।
ॐ वरुणाय नमः पुष्पं समर्पयामि।
ॐ वरुणाय नमः धूपं घ्रापयामि।
ॐ वरुणाय नमः दीपं दर्शयामि।
ॐ वरुणाय नमः नैवेद्यं समर्पयामि।
ॐ वरुणाय नमः आचमनीयं समर्पयामि।
ॐ वरुणाय नमः ताम्बूलं समर्पयामि।
ॐ वरुणाय नमः दक्षिणां समर्पयामि।

अन्त में हाथ जोड़कर निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये कलश देवता से प्रार्थना करें।

कलश स्थापना प्रार्थना मन्त्र

ॐ सरितः सागराः शैलास्तीर्थानि जलदा नदाः।
आयान्तु मम भक्तस्य दुरित–क्षय–कारकाः॥१॥
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठं रुद्रः समाश्रितः।
मूले तस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृ–गणाः स्मृताः॥२॥
कुक्षौ तु सागराः सप्त सप्त–द्वीपा वसुन्धरा।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः साम–वेदोप्यथर्वणः॥३॥
अङ्गैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः।
देव–दानव–सम्वादे मथ्यमाने महोदधौ॥४॥
उत्पन्नोऽसि तदा कुम्भ! विधृतो विष्णुना स्वयं।
त्वत्तः सर्वाणि तीर्थानि देवाः सर्वे त्वयि स्थिताः॥५॥
त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः।
शिवः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापतिः॥६॥
आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवाः स–पैतृकाः।
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि यतः काम–फल–प्रदाः॥७॥
त्वत्–प्रसादादिमं कर्म कर्तुमीहे जलोद्भव!
सान्निध्यं कुरु मे देव! प्रसन्नो भव सर्वदा॥८॥

नवग्रह आवाहन मन्त्र

नौ ग्रहों के सङ्क्षिप्त पूजन के लिये कलश के सम्मुख एक पात्र या मिट्टी का प्याला रख लें। तदुपरान्त बायें हाथ में गन्धाक्षत लेकर सामूहिक रूप में उन सभी नवग्रहों का निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये भावपूर्वक आवाहन करें तथा मन्त्र पढ़कर उक्त पात्र में गन्धाक्षत छोड़ें।

ॐ सूर्य–चन्द्र–मङ्गल–बुध–बृहस्पति–शुक्र–शनि–राहु–केतु–नव–ग्रहेभ्यो नमः।
ॐ नवग्रहाः! इहागच्छत, इह तिष्ठत, मम पूजां गृह्णीत।

नवग्रह दशोपचार-पूजन मन्त्र

निम्नलिखित मन्त्रों से प्रत्येक मन्त्र के आदि में ॐ लगाकर क्रमशः सूर्यादि नौ ग्रहों का पाद्यादि उपचारों से पूजन करें –

ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः शिरसि अर्घ्यं समर्पयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः गन्धाक्षतान् समर्पयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः पुष्पं समर्पयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः धूपम् आघ्रापयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः दीपं दर्शयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः नैवेद्यं निवेदयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः आचमनीयं समर्पयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः ताम्बूलं समर्पयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः दक्षिणां समर्पयामि।

नवग्रह प्रार्थना मन्त्र

हाथ जोड़कर सभी ग्रहों से प्रार्थना करें –

ब्रह्मा–मुरारिस्त्रिपुरान्त–कारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्रः शनि–राहु–केतवः सर्वे ग्रहाः शान्तिकरा भवन्तु॥

षोडश मातृका आवाहन मन्त्र

षोडश मातृकाओं के सङ्क्षिप्त पूजन हेतु कलश के सम्मुख एक पात्र अथवा मिट्टी का पात्र स्थापित करें। तदुपरान्त दायें हाथ में गन्धाक्षत लेकर सामूहिक रूप में निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुये षोडश मातृकाओं का भावपूर्वक आवाहन करें तथा मन्त्र पढ़कर उक्त पात्र में गन्धाक्षत छोड़ें।

ॐ गौरी–पद्मा–शची–मेधा–सावित्री–विजया–जया–देवसेना–स्वधा–स्वाहा–माता
लोक–माता–हृष्टि–पुष्टि–तुष्टि–कुल–देवता–षोडश–मातृकाभ्यो नमः।
ॐ षोडश–मातृकाः! इहागच्छत, इह तिष्ठत, मम पूजां गृह्णीत।

षोडश मातृका दशोपचार पूजन मन्त्र

तत्पश्चात् क्रमशः निम्नलिखित मन्त्रों के माध्यम से सोलह मातृकाओं का पाद्यादि उपचारों द्वारा पूजन करें।

ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः शिरसि अर्घ्यं समर्पयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः गन्धाक्षतान् समर्पयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः पुष्पं समर्पयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः धूपम् आघ्रापयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः दीपं दर्शयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः नैवेद्यं निवेदयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः आचमनीयं समर्पयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः ताम्बूलं समर्पयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः दक्षिणां समर्पयामि।

षोडश मातृका प्रार्थना मन्त्र

तत्पश्चात् हाथ जोड़कर सोलह मातृकाओं से प्रार्थना करें –

ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्गः।
धन्यास्त एव निभृतात्मज–भृत्य–दारा येषां सदाऽभ्युदयदा भवती प्रसन्ना॥

श्री कुबेर पूजा विधि

आपके पास श्री कुबेर की मूर्ति है तो वह पूजा में उपयोग की जा सकती है। यदि आपके पास कुबेर की मूर्ति नहीं है तो उसके स्थान पर आप तिजोरी या आभूषणों के बक्से को श्री कुबेर के रूप में मानिये तथा उसकी पूजा कीजिये। तिजोरी, बक्से आदि की पूजा से पूर्व सिन्दूर से स्वस्तिक-चिह्न बनाना चाहिये तथा उस पर ‘मौली’ बाँधना चाहिये।

ध्यानम्

सर्व प्रथम निम्नलिखित मन्त्र द्वारा श्री कुबेर का ध्यान करें।

श्री कुबेर ध्यान मन्त्र

मनुज–बाह्य–विमान–स्थितम्,
गरुड–रत्न–निभं निधि–नायकम्।
शिव–सखं मुकुटादि–विभूषितम्,
वर–गदे दधतं भजे तुन्दिलम्॥

मन्त्र अर्थ – मानव-स्वरूप विमान पर विराजमान, श्रेष्ठ गरुड़ के समान सभी निधियों के स्वामी, भगवान् शिव के मित्र, मुकुट आदि से सुशोभित और हाथों में वर-मुद्रा एवं गदा धारण करने वाले भव्य श्रीकुबेर की मैं वन्दना करता हूँ।

आवाहनम्

भगवान् श्रीकुबेर का ध्यान करने के उपरान्त तिजोरी-बक्से आदि के सम्मुख आवाहन-मुद्रा प्रदर्शित करते हुये निम्नलिखित मन्त्र द्वारा उनका आवाहन करें।

श्री कुबेर आवाहन मन्त्र

आवाहयामि देव! त्वामिहायाहि कृपां कुरु।
कोशं वर्द्धय नित्यं त्वं परि–रक्ष सुरेश्वर॥

॥श्रीकुबेर–देवम् आवाहयामि॥

मन्त्र अर्थ – हे देव, सुरेश्वर! मैं आपका आवाहन करता हूँ। आप यहाँ पधारें, कृपा करें। सदा मेरे भण्डार की वृद्धि करें और रक्षा करें।

॥ मैं श्रीकुबेर देव का आवाहन करता हूँ ॥

पुष्पाञ्जलि-आसनम्

आवाहन करने के उपरान्त निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीकुबेर देव के आसन के लिये पाँच पुष्प अञ्जलि में लेकर अपने सामने, तिजोरी-बक्से आदि के निकट छोड़े।

श्री कुबेर पुष्पाञ्जलि आसन मन्त्र

नाना–रत्न–समायुक्तं कार्त्त–स्वर–विभूषितम्।
आसनं देव–देवेश! प्रीत्यर्थं प्रतिगृह्यताम्॥

॥श्रीकुबेर–देवाय आसनार्थे पञ्च–पुष्पाणि समर्पयामि॥

मन्त्र अर्थ – हे देवताओं के ईश्वर! विविध प्रकार के रत्न से युक्त स्वर्ण-सज्जित आसन को प्रसन्नता हेतु ग्रहण करें।

॥ भगवान् श्रीकुबेर के आसन के लिये मैं पाँच पुष्प अर्पित करता हूँ ॥

नवोपचार-पूजनम्

तदुपरान्त चन्दन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य द्वारा भगवान् श्रीकुबेर का पूजन निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुये करें।

श्री कुबेर नव उपचार पूजन मन्त्र

ॐ श्रीकुबेराय नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
ॐ श्रीकुबेराय नमः शिरसि अर्घ्यं समर्पयामि।
ॐ श्रीकुबेराय नमः गन्धाक्षतान् समर्पयामि।
ॐ श्रीकुबेराय नमः पुष्पं समर्पयामि।
ॐ श्रीकुबेराय नमः धूपम् आघ्रापयामि।
ॐ श्रीकुबेराय नमः दीपं दर्शयामि।
ॐ श्रीकुबेराय नमः नैवेद्यं निवेदयामि।
ॐ श्रीकुबेराय नमः आचमनीयं समर्पयामि।
ॐ श्रीकुबेराय नमः ताम्बूलं समर्पयामि।

मन्त्र अर्थ – तत्पश्चात् ‘चन्दन-अक्षत-पुष्प-धूप-दीप-नैवेद्य’ द्वारा निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुये भगवती काली का पूजन करें।

पूजन-समर्पणम्

इस प्रकार पूजन करने के पश्चात् बायें हाथ में गन्ध, अक्षत, पुष्प लेकर दाहिने हाथ द्वारा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये ‘तिजोरी-बक्से’ आदि पर छोड़े।

श्री कुबेर पूजा समर्पण मन्त्र

ॐ श्रीकुबेराय नमः।
अनेन पूजनेन श्रीधनाध्यक्षः श्रीकुबेरः प्रीयताम्।
नमो नमः।

मन्त्र अर्थ – श्रीकुबेर को नमस्कार! इस पूजन से श्रीकुबेर भगवान् प्रसन्न हों, उन्हें बारम्बार नमस्कार।

॥ इसी प्रकार श्री-कुबेर पूजा समाप्त हुयी ॥

दीपमालिका पूजा विधि

सर्वप्रथम पारिवारिक परम्परा के अनुसार पूज्य पितरों तथा कुल-देवता, ग्राम-नगर-देवताओं के मध्य में सरसों के तेल का एक बड़ा दीपक तथा उसके चारों ओर ग्यारह-इक्कीस-इक्यावन अथवा अधिक छोटे दीपक, एक परात अर्थात् बड़ी थाली में रखकर सजा लें। तदुपरान्त दीप-देव का ध्यान करें।

ध्यानम्

दीप-देव का ध्यान करते हुये पूजा आरम्भ करनी चाहिये। दीप-देव का ध्यान करते समय निम्नलिखित मन्त्र का जाप करना चाहिये।

दीपमालिका ध्यान मन्त्र

भो दीप! ब्रह्मरूपस्त्वं ह्यन्धकार–विनाशकः।
गृहाण मया कृतां पूजाम् ओजस्तेजः प्रवर्धय॥

मन्त्र अर्थ – हे दीप! आप अन्धकार का नाश करने वाले ब्रह्म-स्वरूप हैं। मेरे द्वारा की गयी पूजा को ग्रहण करें तथा ओज तथा तेज की वृद्धि करें।

प्रार्थना

दीप-देव की पूजा के उपरान्त, निम्नलिखित मन्त्र से प्रार्थना करते हुये दीपमालिका को नमस्कार करें।

दीपमालिका प्रार्थना मन्त्र

शुभं करोतु कल्याणमारोग्यं सुख–सम्पदम्।
मम बुद्धि–प्रकाशं च दीप–ज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
शुभं भवतु कल्याणमारोग्यं पुष्टि–वर्धनम्।
आत्म–तत्त्व–प्रबोधाय दीप–ज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
दीपावलिर्मया दत्ता गृहाण त्वं सुरेश्वरि!
अनेन दीप–दानेन ज्ञान–दृष्टि–प्रदा भव॥

मन्त्र अर्थ – दीप-ज्योति शुभ करे, कल्याण करे, आरोग्य करे, सुख-सम्पदा प्रदान करे, मेरी बुद्धि को प्रकाशित करे, दीप-ज्योति-स्वरूपा आप भगवती को नमस्कार। शुभ कल्याण एवं आरोग्य हो तथा पुष्टि की वृद्धि हो। आत्म-तत्त्व को प्रबुद्ध करने वाली दीप-ज्योति, आपको नमस्कार। हे देवेश्वरि! मेरे द्वारा अर्पित दीप-पँक्ति को आप स्वीकार करें तथा इस दीप-दान से आप मुझे ज्ञान-दृष्टि प्रदान करें।

उक्त प्रकार से दीपमालिका का पूजन करने के पश्चात् दीपमालिका को नमस्कार करें एवं पञ्च-पात्र से दाहिने हाथ में जल लेकर दीप-मालिका के चारों ओर घुमाते हुये भूमि पर छिड़क दें।

तत्पश्चात् धान का लावा, लाई, ईख, नारियल, फल एवं मिष्टान्न आदि उपलब्ध वस्तुयें अर्पित करें। कलश, भगवान गणेश एवं भगवती लक्ष्मी की नवीन मूर्तियों, तिजोरी, बही-खातों तथा दीपमालिका के सम्मुख धान का लावा छिड़क दें।

पुष्पाञ्जलि-आसनम्

दीप-देव के ध्यान के पश्चात् दीप-देव का पूजन करते हुये निम्नलिखित मन्त्र का जाप करना चाहिये तथा दोनों हाथों की हथेलियों जोड़कर अञ्जलि में तीन पुष्प लेकर दीपक के समक्ष अर्पित कर देना चाहिये।

दीपमालिका पुष्पाञ्जलिः मन्त्र

ॐ दीप–वृक्षाय नमः।

मन्त्र अर्थ – दीप-वृक्ष को नमस्कार है।

विसर्जन विधि

विसर्जन एक संस्कृत शब्द है, जो अन्तिम अनुष्ठान एवं देवता के प्रस्थान के लिये सम्मानपूर्वक अनुरोध करने के कार्य को सन्दर्भित करता है।

किसी भी पूजा के आरम्भ में, पूजा के उद्देश्य से सर्वप्रथम मूर्ति में पीठासीन देवता का आवाहन किया जाता है। पूजा के अन्त में, पीठासीन देवता से मूर्ति से प्रस्थान करने का अनुरोध किया जाता है।

प्रणाम

उपर्युक्त प्रकार पूजा करने के पश्चात्, पूजा में उपस्थित सभी बालक-पुरुष-स्त्रियाँ अपने हाथों में पुष्प लेकर भगवान गणेश, महालक्ष्मी, महाकाली, महासरस्वती तथा कुबेर जी की जय-जयकार करें तथा छोटे से बड़े के क्रम में उनके सम्मुख पुष्प अर्पित करते हुये दण्डवत् प्रणाम करें।

दीपमालिका ध्यान मन्त्र

भो दीप! ब्रह्मरूपस्त्वं ह्यन्धकार–विनाशकः।
गृहाण मया कृतां पूजाम् ओजस्तेजः प्रवर्धय॥

मन्त्र अर्थ – हे दीप! आप अन्धकार का नाश करने वाले ब्रह्म-स्वरूप हैं। मेरे द्वारा की गयी पूजा को ग्रहण करें तथा ओज तथा तेज की वृद्धि करें।

विसर्जनम्

दण्डवत् प्रणाम करने के पश्चात् पूजा करने वाला व्यक्ति दाहिने हाथ में अक्षत, पुष्प लेकर विसर्जन हेतु निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

दीवाली विसर्जन मन्त्र

यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्।
इष्ट–काम–समृद्घ्यर्थं पुनरागमनाय च॥

मन्त्र अर्थ – सभी देवगण मेरे द्वारा की गयी पूजा को स्वीकार कर अभीष्ट कामनाओं की समृद्धि के लिये पुनः आगमन हेतु यहाँ से विदा हों।

समापन

उक्त मन्त्र का उच्चारण करने के पश्चात् पूजा करने वाला व्यक्ति अक्षत-पुष्प देवताओं के सम्मुख छोड़कर उन्हें प्रणाम करे। पूजा में सम्मिलित सभी लोग पूजा करने वाले को प्रणाम करें, दक्षिणा दें तथा प्रसाद ग्रहण करें।

दीपमालिका पुष्पाञ्जलिः मन्त्र

ॐ दीप–वृक्षाय नमः।

मन्त्र अर्थ – दीप-वृक्ष को नमस्कार है।

Diwali Poojan Vidhi – Complete Guide

दीवाली पूजा उचित दीवाली पूजा मुहूर्त में ही की जानी चाहिये। दीवाली पूजा मुहूर्त निर्धारित करनें में स्थिर लग्न, प्रदोषकाल एवं अमावस्या तिथि पर विचार किया जाता है। सम्पूर्ण दीवाली पूजा में निम्नलिखित पूजा सम्म्लित होती हैं।

  1. आत्मशोधन – आन्तरिक एवं बाह्य आत्म शुद्धि
  2. संकल्प – सम्पूर्ण विधि-विधान से दीवाली पूजा के अनुष्ठान सम्पन्न करने का पवित्र सङ्कल्प ग्रहण किया जाता है।
  3. शान्ति-पाठ– समस्त प्राणियों के जीवन में सुखः, शान्ति व समृद्धि हेतु शान्ति पाठ किया जाता है।
  4. मङ्गल-पाठ– समस्त प्राणियों की मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु मङ्गल पाठ किया जाता है।
  5. कलश-स्थापना– कलश स्थापना की विस्तृत पूजा विधि
  6. गणपति पूजा– संक्षिप्त पञ्च-चरणीय गणेश पूजन विधि
  7. नव-ग्रह पूजा– संक्षिप्त नव-ग्रह पूजन
  8. षोडश मातृका-पूजा– संक्षिप्त षोडश मातृका पूजन
  9. भगवान गणेश की नवीन मूर्ति की पूजा– भगवान गणेश की षोडशोपचार पूजा
  10. श्रीलक्ष्मी की नवीन मूर्ति की पूजा– देवी लक्ष्मी की षोडशोपचार पूजा
  11. महा-काली पूजा– लेखनी-दावात पर महा-काली पूजा
  12. सरस्वती पूजा– बही-खाते पर सरस्वती पूजा
  13. कुबेर पूजातिजोरी-बक्से पर श्रीकुबेर पूजा
  14. दीप-मालिका पूजा– दीप-मालिका पूजा विधि के समस्त आवश्यक चरण
  15. विसर्जन– प्रार्थना द्वारा औपचारिक रूप से दीवाली पूजा सम्पन्न करना

 

उपरोक्त पूजा सम्पूर्ण विधि-विधान से की जाती है। सम्पूर्ण दीवाली पूजा सम्पन्न करने में कुछ घण्टों का समय लग सकता है। यह सम्भव है कि लक्ष्मी पूजा मुहूर्त अल्प समय के लिये ही उपलब्ध हो और उसमें सम्पूर्ण दीवाली पूजा सम्पन्न न की जा सके। अतः दीवाली पूजा, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त से पूर्व ही आरम्भ की जा सकती है, जिससे लक्ष्मी पूजा का समय उपलब्ध मुहूर्त के साथ संयोजित हो सके। शेष पूजा, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त के समाप्त होने के पश्चात् भी की जा सकती है।

यह स्मरण रहे कि दीवाली पूजा में प्रज्वलित किया गया दीप रात्रि पर्यन्त निर्विघ्न प्रज्वलित रहना चाहिये। पूजनोपरान्त श्री सूक्त, लक्ष्मी सूक्त तथा देवी लक्ष्मी की अन्य स्तुतियों का पाठ करना चाहिये। यदि सम्भव हो तो देवी लक्ष्मी की स्तुति हेतु जागरण करना चाहिये।

आत्मशोधन -1

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥

मन्त्रार्थ – चाहे पवित्र हो (स्नान आदि से) अथवा अपवित्र हो (किसी अशुचि पदार्थ के स्पर्श से), किसी भी दशा में हो (सोती, जागती, उठती, बैठती, चलती), जो परमात्मा (पञ्च परमेष्ठी) का स्मरण करता है वह (उस समय) बाह्य (शरीर) और अभ्यन्तर (मन) से पवित्र होता है।

आत्मशोधन -2

तत्पश्चात् पुनः पञ्चपात्र से दाहिने हाथ में जल लेकर निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुये तीन बार आचमन करें।

आत्मशोधन आचमन

ॐ आत्मतत्त्वं शोधयामि स्वाहा।
ॐ विद्यातत्त्वं शोधयामि स्वाहा।
ॐ शिवतत्त्वं शोधयामि स्वाहा।

संकल्प विधि:

संकल्प एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है—हृदय अथवा मन में निर्मित धारणा, कार्य करने की गम्भीर प्रतिज्ञा, दृढ़ भावना, निर्णय अथवा प्रबल इच्छाशक्ति।

1. संकल्प की क्रिया:

आचमन करने के पश्चात् पञ्चपात्र से जल लेकर अपने दाहिने हाथ की हथेली को स्वच्छ करें। फिर दाहिने हाथ की हथेली में जल, अक्षत, पुष्प, कुछ द्रव्य (सिक्का) और सुपारी लेकर पूजा सङ्कल्प पाठ करें। पाठ पूर्ण होने पर जल को अपने समक्ष भूमि पर (अथवा किसी पात्र में) छोड़ दें।

2. संकल्प मंत्र:

ॐ तत्सत् अद्यैतस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय–प्रहरार्द्धे श्वेत–वराह–कल्पे
जम्बू–द्वीपे भरत–खण्डे अमुक–प्रदेशे अमुक–पुण्य–क्षेत्रे कलियुगे
कलि–प्रथम–चरणे अमुक–संवत्सरे कार्तिक–मासे कृष्ण–पक्षे
अमावस्या–तिथौ अमुक–वासरे अमुक–गोत्रोत्पन्नो अमुक–नाम–अहं
सपत्नीकस्य सुपुत्रस्य सबान्धवस्य सर्वत्र यशो–विजयादि–लाभार्थं
सर्वारिष्ट–निवृत्ति–पूर्वक–सकल–मनोकामना–सिद्ध्यर्थं
अप्राप्त–लक्ष्मी–प्राप्त्यर्थं प्राप्त–लक्ष्मीं चिर–काल–संरक्षणार्थं
प्रचलित–व्यापार–प्रतिष्ठाने बहु–धन–लाभार्थं श्रीमहा–लक्ष्मी–प्रसन्नार्थं

    यदि नये बही-खाते का पूजन हो:

अमुक–नामकस्य मम व्यापार–प्रतिष्ठानस्य
नूतन–वासना–पूजन–कर्मणः साङ्गता–सिद्ध्यर्थं

 

इतना और जोड़ लेना चाहिये

स्वस्ति–वाचन–कलश–स्थापन–पूर्वकं यथा–सम्पादित–सामग्र्या
गणपति–सूर्यादि–नवग्रह–षोडश–मातृकादि–पूजन–सहितं दीपावल्यां
श्रीगणेश–लक्ष्मी–प्रतिमा–पूजनम् करिष्ये।

संकल्प विधि:

शान्ति-पाठ से देह सभी प्रकार से शुद्ध हो जाती है तथा अकल्याण एवं अशुभता का नाश होता है।

शान्ति पाठ मन्त्र-१

ॐ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।
देवा नो यथा सदमिद्वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे–दिवे॥


मन्त्रार्थ
– हमारे समीप चारों ओर से ऐसे कल्याणकारी विचार आते रहें जो किसी से न प्रभावित हों, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके एवं अज्ञात विषयों को प्रकट करने वाले हों। प्रगति को न बाधित करने वाले तथा सदैव रक्षा में तत्पर देवता प्रतिदिन हमारी वृद्धि के लिये तत्पर रहें।

शान्ति पाठ मन्त्र-२

ॐ देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो निवर्तताम्।
देवानां सख्यमुपसेदिमा वयं देवा न आयुः प्रतिरन्तु जीवसे॥


मन्त्रार्थ
– यजमान की इच्छा रखने वाले देवताओं की कल्याणकारिणी श्रेष्ठ बुद्धि सदा हमारे सम्मुख रहे, देवताओं का दान हमें प्राप्त हो, हम देवताओं की मित्रता प्राप्त करें, देवता हमारी आयु में जीवन के निमित्त वृद्धि करें।

शान्ति पाठ मन्त्र-३

ॐ तान् पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्।
अर्यमणं वरुणं सोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्॥


मन्त्रार्थ
– हम वेदरुप सनातन वाणी के द्वारा अच्युतरुप भग, मित्र, अदिति, प्रजापति, अर्यमण, वरुण, चन्द्रमा एवं अश्विनीकुमारों का आवाहन करते हैं। ऐश्वर्यमयी सरस्वती महावाणी हमें सभी प्रकार का सुख प्रदान करें।

शान्ति पाठ मन्त्र-४

ॐ तन्नो वातो मयो भुवातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः।
तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम्॥


मन्त्रार्थ
– वायुदेवता हमें सुखकारी औषधियाँ प्राप्त करायें। माता पृथ्वी एवं पिता स्वर्ग भी हमें सुखकारी औषधियाँ प्रदान करें। सोम का अभिषव करने वाले सुखदाता ग्रावा उस औषधरुप अदृष्ट को प्रकट करें। हे अश्विनी-कुमारों! आप दोनों सभी के आधार हैं, हमारी प्रार्थना स्वीकार करें।

शान्ति पाठ मन्त्र-५

ॐ तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम्।
पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥


मन्त्रार्थ
– हम स्थावर-जंगम के स्वामी, बुद्धि को सन्तोष प्रदान करने वाले रुद्रदेवता का रक्षा के निमित्त आवाहन करते हैं। वैदिक ज्ञान एवं धन की रक्षा करने वाले, पुत्र आदि के पालक, अविनाशी पुष्टि-कर्ता देवता हमारी वृद्धि एवं कल्याण के निमित्त हों।

शान्ति पाठ मन्त्र-६

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥


मन्त्रार्थ
– महती कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें, जिसको संसार का ज्ञान है तथा जिसका सब पदार्थों में स्मरण है, समस्त प्राणियों के पोषणकर्ता वे पूषा (सूर्य) हमारा कल्याण करें। जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें। वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें।

शान्ति पाठ मन्त्र-७

ॐ पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभं यावानो विदथेषु जग्मयः।
अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह॥


मन्त्रार्थ
– चितकबरे वर्ण के घोड़ों वाले, अदिति माता से उत्पन्न, सभी का कल्याण करने वाले, यज्ञशालाओं में जाने वाले, अग्निरुपी जिह्वा वाले, सर्वज्ञ, सूर्यरुप नेत्र वाले मरुद्गण एवं विश्वेदेव देवता हविरुप अन्न को ग्रहण करने के लिये हमारे इस यज्ञ में पधारें।

शान्ति पाठ मन्त्र-८

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवागं सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥


मन्त्रार्थ
– हे यजमान के रक्षक देवताओं! हम दृढ़ अङ्गों वाले शरीर से पुत्र आदि के साथ मिलकर आपकी स्तुति करते हुये कानों से कल्याणपूर्ण वचनों का श्रवण करें, नेत्रों से कल्याणमयी वस्तुओं का दर्शन करें, देवताओं की उपासना-योग्य आयु को प्राप्त करें।

शान्ति पाठ मन्त्र-९

ॐ शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्राजरसं तनूनां।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मानो मध्यारीरिषतायुर्गन्तोः॥


मन्त्रार्थ
– हे देवताओं! आप सौ वर्ष की आयु-पर्यन्त हमारे समीप रहें, जिस आयु में हमारे शरीर को जरावस्था प्राप्त हो, जिस आयु में हमारे पुत्र पिता अर्थात् पुत्रवान् बन जायें, हमारी उस गमनशील आयु को आप लोग मध्य में खण्डित न होने दें।।

शान्ति पाठ मन्त्र-१०

ॐ अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः।
विश्वेदेवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्॥


मन्त्रार्थ
– अखण्डित पराशक्ति स्वर्ग है, वही अन्तरिक्ष-रुप है, वही पराशक्ति माता-पिता एवं पुत्र भी है। समस्त देवता पराशक्ति के ही स्वरुप हैं, अन्त्यज सहित चारों वर्णों के सभी मनुष्य पराशक्तिमय हैं, जो उत्पन्न हो चुका है तथा जो उत्पन्न होगा, सब पराशक्ति के ही स्वरुप हैं।

शान्ति पाठ मन्त्र-११

पृथिवी शान्तिरन्तरिक्षगं शान्तिर्द्यौश्शान्तिर्दिशः शान्तिरवान्तरदिशाश्शान्तिरग्निश्शान्तिर्वायुः
शान्तिरादित्यश्शान्तिश्चन्द्रमाश्शान्तिर्नक्षत्राणि शान्तिरापश्शान्तिरोषधयश्शान्तिर्वनस्पतयश्शान्तिर्गौः
शान्तिरजा शान्तिरश्वश्शान्तिः पुरुषश्शान्तिर्ब्रह्म शान्तिर्ब्राह्मणश्शान्तिः शान्तिरेव शान्तिश्शान्तिर्मे अस्तु शान्तिः।


मन्त्रार्थ
– पृथ्वीलोक शान्तिदायक हो, अन्तरिक्षलोक शान्तिदायक हो, द्युलोक शान्तिदायक हो। समस्त दिशायें शान्तिदायक हों, अग्नि एवं वायु शान्तिदायक हो। सूर्य, चन्द्र एवं सम्पूर्ण नक्षत्र मण्डल शान्तिदायक हो, जल, औषधियाँ एवं वनस्पतियाँ शान्तिदायक हों। गौ, अश्व आदि पशु शान्तिदायक हों। पुरुष शान्तिदायक हो। ब्रह्म अर्थात् महान परमेश्वर हमें शान्ति प्रदान करने वाले हों।

ब्राह्मण शान्तिदायक हों, उनका दिया हुआ ज्ञान एवं वेद शान्ति प्रदान करने वाले हों। सम्पूर्ण चराचर जगत शान्ति पूर्ण हो अर्थात् सर्वत्र शान्ति ही शान्ति हो। ऐसी शान्ति मुझे प्राप्त हो तथा उसमें सदा वृद्धि ही होती रहे। अभिप्राय यह है कि सृष्टि का कण-कण हमें शान्ति प्रदान करने वाला हो। समस्त पर्यावरण ही सुखद व शान्तिप्रद हो।

मङ्गल पाठ के मन्त्र

शान्ति-पाठ से देह सभी प्रकार से शुद्ध हो जाती है तथा अकल्याण एवं अशुभता का नाश होता है।

मङ्गल पाठ मन्त्र-१

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-२

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-३

विद्यारम्भे विवाहे च विदेशगमने तथा।
संग्रामे सङ्कटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-४

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-५

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके!
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि! नमोऽस्तु ते॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-६

सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम्।
येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनो हरिः॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-७

तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव।
विद्याबलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपतेरंघ्रियुगं स्मरामि॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-८

लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-९

विनायकं गुरुं भानुं ब्रह्मा–विष्णु–महेश्वरान्।
सरस्वतीं प्रणम्यादौ सर्व–कार्यार्थ–सिद्धये॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-१०

अभीप्सितार्थ–सिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः।
सर्व–विघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतये नमः॥

मङ्गल पाठ मन्त्र-११

सर्वेष्वारब्ध–कार्येषु त्रयस्त्रि–भुवनेश्वराः।
देवाः दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशान–जनार्दनाः॥

कलश स्थापना विधि

पूजा स्थल पर मिट्टी की ढेरी पर सप्तधान्य रखें और उस पर जल, गंगाजल, सिक्का व सुपारी युक्त कलश स्थापित करें। कलश के मुख पर पंचपल्लव (आम के पत्ते) रखकर, नारियल को लाल वस्त्र में लपेटकर उस पर प्रतिष्ठित करें।

कलश के नीचे की भूमि को हाथ से स्पर्श करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-१

ॐ भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्व–धाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री।
पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृ ह पृथिवीं मा हि सीः॥

कलश स्थापना के स्थान पर मिट्टी तथा जौ डालें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-२

ॐ धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणायत्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा।
दीर्घामनु–प्रसितिमायुषे द्यां देवो वः सविता हिरण्य–पाणिः।
प्रति–गृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि॥

कलश को सावधानीपूर्वक उठाकर उसी स्थान पर स्थापित करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-३

ॐ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्ति्वन्दवः।
पुनरूर्ज्जा निवर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरु–धारा पयस्वती पुनर्मा विशताद् रयिः॥

कलश में जल अर्पित करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-४

ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भ–सर्ज्जनीस्थो।
वरुणस्य ऋत–सदन्यसि वरुणस्य ऋत–सदनमसि वरुणस्य ऋत–सदनमासीद॥

कलश के गले में लाल वस्त्र अथवा मोली लपेटें तथा निम्नलिखित मन्त्र उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-५

ॐ वसोः पवित्रमसि शत–धारं वसोः पवित्रमसि सहस्र–धारम्।
देवस्त्वा सविता पुनातु वसोः पवित्रेण शत–धारेण सुप्वा काम–धुक्षः॥

कलश में सुपारी डालें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-६

ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः।
बृहस्पति–प्रसूतास्ता नो मुंचंत्वं हसः॥

कलश में एक रुपये का सिक्का डालते हुये निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-७

ॐ हिरण्य–गर्भः सम–वर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥

गन्ध, रोली आदि अर्पित करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-८

ॐ गन्ध–द्वारां दुराधर्षां नित्य–पुष्टां करीषिणीं।
ईश्वरीगं सर्व–भूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥

हल्दी सहित सभी औषधियाँ कलश में डाल दें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-९

ॐ या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा।
मनैनु बभ्रूणा मह शतं धामानि सप्त च॥

कलश में सात प्रकार की मिट्टी डालें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-१०

ॐ स्योना पृथिवि! नो भवान्नृक्षरा निवेशिनी।
यच्छा नः शर्म स–प्रथाः॥

कलश पर दूर्वा अर्पित करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-११

ॐ काण्डात् काण्डात् प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि।
एवानो दूर्वे! प्रतनु सहस्रेण शतेन च॥

कलश पर आम, बरगद, पीपल अथवा गूलर के पत्ते अर्पित करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-११

ॐ अश्वत्थे वो निषदनम्पर्णे वो वसतिष्कृत।
गोभाज इत्किलासथ यत्स नवथ पूरुषम्॥

कलश पर कुशा अर्पित करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-११

ॐ पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः।
तस्य ते पवित्र–पते पवित्र–पूतस्य यत् कामः पुनेतच्छकेयम्॥

जौ अथवा चावल से भरा बर्तन कलश पर रखें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-११

ॐ पूर्णादर्वि परापत सु–पूर्णा पुनरापत।
वस्नेव विक्रीणा वहा इष मूर्ज्ज शत–क्रतो॥

अक्षत अर्पित करते हुये वरुण देव की स्थापना करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

कलश स्थापना मन्त्र-११

ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं,
तनो त्वरिष्टं यज्ञ समिमं दधातु।
विश्वे–देवा स इह मादयन्ताम् ॐ प्रतिष्ठ॥

आवाहन मुद्रा, आर्थत् दोनों हथेलियों को जोड़कर तथा दोनों अँगूठों को अन्दर की ओर मोड़कर प्रदर्शित करते हुये वरुण देव के आवाहन हेतु निम्नलिखित मन्त्र का जाप करना चाहिये।

कलश स्थापना आवाहन

ॐ भूर्भुवः स्वः वरुण! इहागच्छ, इह तिष्ठ, मम पूजां गृहाण।

निम्नलिखित मन्त्रों का जाप करते हुये चन्दन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से श्री वरुण देव का पूजन करें।

कलश दशोपचार पूजन मन्त्र

ॐ वरुणाय नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
ॐ वरुणाय नमः शिरसि अर्घ्यं समर्पयामि।
ॐ वरुणाय नमः गन्धाक्षतं समर्पयामि।
ॐ वरुणाय नमः पुष्पं समर्पयामि।
ॐ वरुणाय नमः धूपं घ्रापयामि।
ॐ वरुणाय नमः दीपं दर्शयामि।
ॐ वरुणाय नमः नैवेद्यं समर्पयामि।
ॐ वरुणाय नमः आचमनीयं समर्पयामि।
ॐ वरुणाय नमः ताम्बूलं समर्पयामि।
ॐ वरुणाय नमः दक्षिणां समर्पयामि।

अन्त में हाथ जोड़कर निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये कलश देवता से प्रार्थना करें।

कलश स्थापना प्रार्थना मन्त्र

ॐ सरितः सागराः शैलास्तीर्थानि जलदा नदाः।
आयान्तु मम भक्तस्य दुरित–क्षय–कारकाः॥१॥
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठं रुद्रः समाश्रितः।
मूले तस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृ–गणाः स्मृताः॥२॥
कुक्षौ तु सागराः सप्त सप्त–द्वीपा वसुन्धरा।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः साम–वेदोप्यथर्वणः॥३॥
अङ्गैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः।
देव–दानव–सम्वादे मथ्यमाने महोदधौ॥४॥
उत्पन्नोऽसि तदा कुम्भ! विधृतो विष्णुना स्वयं।
त्वत्तः सर्वाणि तीर्थानि देवाः सर्वे त्वयि स्थिताः॥५॥
त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः।
शिवः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापतिः॥६॥
आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवाः स–पैतृकाः।
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि यतः काम–फल–प्रदाः॥७॥
त्वत्–प्रसादादिमं कर्म कर्तुमीहे जलोद्भव!
सान्निध्यं कुरु मे देव! प्रसन्नो भव सर्वदा॥८॥

श्री गणपति आविर्भाव मन्त्र

कलश के नीचे की भूमि को हाथ से स्पर्श करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

ॐ गणानां त्वा गणपतिगं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्॥

श्री गणपति आवाहन मन्त्र

निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये अक्षत अर्पित करें तथा यह भावना करें कि भगवान गणेश वहाँ प्रकट हो गये हैं। तदुपरान्त निम्नलिखित मन्त्र से उनका आवाहन करें। श्री गणेश का आवाहन करते समय आपके हाथ वक्षस्थल के समक्ष आवाहन मुद्रा में होने चाहिये। आवाहन मुद्रा दोनों हथेलियों को जोड़कर एवं दोनों अँगूठों को अन्दर की ओर मोड़कर प्रदर्शित की जाती है।

ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीगणपते!
इहागच्छ, इह तिष्ठ, मम पूजां गृहाण।

श्री गणपति दशोपचार पूजन मन्त्र

प्राण प्रतिष्ठा के पश्चात् सुपारी पर जल अर्पित करके निम्नलिखित मन्त्रों से भगवान गणेश की पाद्य, अर्घ्य, गन्धाक्षत आदि से पूजा करें।

ॐ गणपतये नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
ॐ गणपतये नमः शिरसि अर्घ्यं समर्पयामि।
ॐ गणपतये नमः गन्धाक्षतं समर्पयामि।
ॐ गणपतये नमः पुष्पं समर्पयामि।
ॐ गणपतये नमः धूपं घ्रापयामि।
ॐ गणपतये नमः दीपं दर्शयामि।
ॐ गणपतये नमः नैवेद्यं समर्पयामि।
ॐ गणपतये नमः आचमनीयं समर्पयामि।
ॐ गणपतये नमः ताम्बूलं समर्पयामि।
ॐ गणपतये नमः दक्षिणां समर्पयामि।

श्री गणपति प्राण प्रतिष्ठा मन्त्र

तत्पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये एवं लेलिहान मुद्रा प्रदर्शित करते हुये सुपारी की प्राण प्रतिष्ठा करें।

ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्व बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनो त्वरिष्टं यज्ञ समिमं दधातु।
विश्वे–देवा स इह मादयन्ताम् ॐ प्रतिष्ठ।

श्री गणपति प्रार्थना मन्त्र

अन्त में हाथ जोड़कर निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये भगवान गणेश से प्रार्थना करें।

अनेन पूजनेन श्रीगणपतिः प्रीयताम्।

नवग्रह आवाहन मन्त्र

नौ ग्रहों के सङ्क्षिप्त पूजन के लिये कलश के सम्मुख एक पात्र या मिट्टी का प्याला रख लें। तदुपरान्त बायें हाथ में गन्धाक्षत लेकर सामूहिक रूप में उन सभी नवग्रहों का निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये भावपूर्वक आवाहन करें तथा मन्त्र पढ़कर उक्त पात्र में गन्धाक्षत छोड़ें।

ॐ सूर्य–चन्द्र–मङ्गल–बुध–बृहस्पति–शुक्र–शनि–राहु–केतु–नव–ग्रहेभ्यो नमः।
ॐ नवग्रहाः! इहागच्छत, इह तिष्ठत, मम पूजां गृह्णीत।

नवग्रह दशोपचार-पूजन मन्त्र

निम्नलिखित मन्त्रों से प्रत्येक मन्त्र के आदि में ॐ लगाकर क्रमशः सूर्यादि नौ ग्रहों का पाद्यादि उपचारों से पूजन करें –

ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः शिरसि अर्घ्यं समर्पयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः गन्धाक्षतान् समर्पयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः पुष्पं समर्पयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः धूपम् आघ्रापयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः दीपं दर्शयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः नैवेद्यं निवेदयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः आचमनीयं समर्पयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः ताम्बूलं समर्पयामि।
ॐ सूर्यादि–नव–ग्रहेभ्यो नमः दक्षिणां समर्पयामि।

नवग्रह प्रार्थना मन्त्र

हाथ जोड़कर सभी ग्रहों से प्रार्थना करें –

ब्रह्मा–मुरारिस्त्रिपुरान्त–कारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्रः शनि–राहु–केतवः सर्वे ग्रहाः शान्तिकरा भवन्तु॥

षोडश मातृका आवाहन मन्त्र

षोडश मातृकाओं के सङ्क्षिप्त पूजन हेतु कलश के सम्मुख एक पात्र अथवा मिट्टी का पात्र स्थापित करें। तदुपरान्त दायें हाथ में गन्धाक्षत लेकर सामूहिक रूप में निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुये षोडश मातृकाओं का भावपूर्वक आवाहन करें तथा मन्त्र पढ़कर उक्त पात्र में गन्धाक्षत छोड़ें।

ॐ गौरी–पद्मा–शची–मेधा–सावित्री–विजया–जया–देवसेना–स्वधा–स्वाहा–माता
लोक–माता–हृष्टि–पुष्टि–तुष्टि–कुल–देवता–षोडश–मातृकाभ्यो नमः।
ॐ षोडश–मातृकाः! इहागच्छत, इह तिष्ठत, मम पूजां गृह्णीत।

षोडश मातृका दशोपचार पूजन मन्त्र

तत्पश्चात् क्रमशः निम्नलिखित मन्त्रों के माध्यम से सोलह मातृकाओं का पाद्यादि उपचारों द्वारा पूजन करें।

ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः शिरसि अर्घ्यं समर्पयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः गन्धाक्षतान् समर्पयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः पुष्पं समर्पयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः धूपम् आघ्रापयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः दीपं दर्शयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः नैवेद्यं निवेदयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः आचमनीयं समर्पयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः ताम्बूलं समर्पयामि।
ॐ गौर्यादि–षोडश–मातृकाभ्यो नमः दक्षिणां समर्पयामि।

षोडश मातृका प्रार्थना मन्त्र

तत्पश्चात् हाथ जोड़कर सोलह मातृकाओं से प्रार्थना करें –

ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्गः।
धन्यास्त एव निभृतात्मज–भृत्य–दारा येषां सदाऽभ्युदयदा भवती प्रसन्ना॥

गणेश पूजा विधि

हम दीवाली के दौरान गणेश पूजा विधि को विस्तृत रूप से उपलब्ध करा रहे हैं। दीवाली पूजा के लिये लोगों को भगवान गणेश की नवीन प्रतिमा खरीदनी चाहिये। यह पूजा विधि श्री गणेश की नवीन प्रतिमा या मूर्ति के लिये प्रदान की गयी है। इस पूजा विधि में भगवान गणेश की पूजा करने के लिये सोलह चरण सम्मिलित हैं जिसे षोडशोपचार पूजा के नाम से जाना जाता है।

ध्यानम्

पूजा के प्रारम्भ में भगवान गणेश का ध्यान करना चाहिये। पूर्व स्थापित गणेश प्रतिमा के समक्ष ध्यान किया जाना चाहिये। भगवान गणेश का ध्यान करते हुये निम्नलिखित मन्त्र का जाप करें।

श्री गणेश ध्यान मन्त्र

उद्यद्–दिनेश्वर–रुचिं निज–हस्त–पद्मैः,
पाशांकुशाभय–वरान् दधतं गजास्यम्।
रक्ताम्बरं सकल–दुःखहरं गणेशम्,
ध्याये प्रसन्नमखिलाभरणाभिरामम्॥

मन्त्र अर्थ – मैं सभी दुःखों को हरनेवाले गज-मुख उन भगवान् गणेश का ध्यान करता हूँ, जो रक्त-वस्त्र पहने हैं, जिनके शरीर का वर्ण उदय-कालीन सूर्य के समान तेज-वन्त है, जो अपने कर-कमलों में पाश, अंकुश, अभय और वर धारण किये हैं और सुन्दर-मनोहर विविध प्रकार के अलङ्कारों से सुसज्जित होकर प्रसन्न हैं।

आवाहनम्

श्री गणेश जी का ध्यान करने के उपरान्त, मूर्ति के समक्ष आवाहन मुद्रा में, अर्थात् दोनों हथेलियों को ऊपर की ओर एक साथ खोले हुये एवं अँगूठों को अपनी ओर मोड़े हुये निम्नलिखित मन्त्र का जाप करें।

श्री गणेश आवाहन मन्त्र

आगच्छ देव–देवेश! तेजोराशे गणपते!
क्रियमाणां मया पूजां गृहाण सुर–सत्तम!

॥श्रीमद्–गणपति–देवम् आवाहयामि॥

मन्त्र अर्थ – हे देवताओं के ईश्वर! तेज-सम्पन्न हे संसार के स्वामिन्! हे देवोत्तम! आइये, मेरे द्वारा की जाने वाली पूजा को स्वीकार करें।

॥ मैं भगवान् श्री गणेश का आवाहन करता हूँ ॥

पुष्पाञ्जलिः

गणेश जी का आवाहन करने के पश्चात् दोनों हथेलिओं अर्थात् अञ्जलि में पाँच पुष्प लीजिये तथा भगवान गणेश की प्रतिमा के समक्ष पुष्पों को अर्पित कर, निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये आसन ग्रहण करायें।

श्री गणेश पुष्पाञ्जलि मन्त्र

नानारत्न–समायुक्तं कार्त–स्वर–विभूषितम्।
आसनं देव देवेश! प्रीत्यर्थं प्रतिगृह्यताम्॥

॥श्रीगणेश–देवाय नमः आसनार्थे पञ्च–पुष्पाणि समर्पयामि॥

मन्त्र अर्थ – हे देवताओं के ईश्वर! विविध प्रकार के रत्न से युक्त स्वर्ण-सज्जित आसन को प्रसन्नता हेतु ग्रहण करें।

॥ भगवान् श्रीगणेश के आसन के लिये मैं पाँच पुष्प अर्पित करता हूँ ॥

स्वागतम्

गणेश जी को पुष्पों का आसन अर्पण करने के पश्चात् हाथ जोड़कर निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये भगवान गणेश का करबद्ध स्वागत करें।

श्री गणेश स्वागत मन्त्र

श्रीगणेश–देव! स्वागतम्।

मन्त्र अर्थ – हे भग्वान् गणेश! आपका स्वागत है।

पाद्यम्

भगवान गणेश का स्वागत करने के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये गणेश जी के चरण प्रक्षालन हेतु जल अर्पित करें।

श्री गणेश पाद्य मन्त्र

पाद्यं गृहाण देवेश सर्वक्षेमसमर्थ भोः!
भक्त्या समर्पितं देव गणपते! नमोऽस्तु ते॥

॥श्रीगणेश–देवाय नमः पाद्यं समर्पयामि॥

मन्त्र अर्थ – सभी प्रकार के कल्याण करने में सक्षम हे देवेश्वर! चरण धोने हेतु जल भक्ति-पूर्वक समर्पित है। उसे स्वीकार करें। हे विश्वेश्वर भगवन्! आपको नमस्कार है।

॥ भगवान् श्रीगणेश को चरण धोने के लिये यह जल है – उन्हें नमस्कार ॥

अर्घ्यम्

पाद प्रक्षालन के उपरान्त निम्नलिखत मन्त्र का जाप करते हुये भगवान गणेश को अभिषेक हेतु जल अर्पित करें।

श्री गणेश अर्घ्य मन्त्र

नमस्ते देव देवेश! नमस्ते धरणी–धर!
नमस्ते सर्वनागेन्द्र नमस्ते पुरुषोत्तम।
गन्ध–पुष्पाक्षतैर्युक्तं फल–द्रव्य–समन्वितम्।
गृहाण तोयमर्घ्यर्थं परमेश्वर वत्सल!

॥श्रीगणेश–देवाय नमः अर्घ्यं समर्पयामि॥

मन्त्र अर्थ – हे देवेश्वर! आपको नमस्कार। हे धरती को धारण करने वाले! आपको नमस्कार। हे जगत् के आधार-स्वरूप गणेश! आपको नमस्कार। शिर के अभिषेक के लिये यह जल (अर्घ्य) स्वीकार करें। हे कृपालु परमेश्वर! चन्दन-पुष्प-अक्षत से युक्त, फल और द्रव्य के सहित यह जल शिर के अभिषेक के लिये स्वीकार करें।

॥ भगवान् श्रीगणेश के लिये अर्घ्य समर्पित है ॥

गन्ध-समर्पणम्/चन्दन-समर्पणम्

निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये भगवान गणेश को चन्दन अर्पित करें।

श्री गणेश चन्दन समर्पण मन्त्र

श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्।
विलेपनं गणपते! चन्दनं प्रतिगृह्यताम्॥

॥श्रीगणेश–देवाय नमः चन्दनं समर्पयामि॥

मन्त्र अर्थ – हे गणपते! मनोहर और सुगन्धित चन्दन शरीर में लगाने हेतु ग्रहण करें।

॥ भगवान् श्रीगणेश के लिये चन्दन समर्पित करता हूँ ॥

पुष्प-समर्पणम्

निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये गणेश जी को पुष्प अर्पित करें।

श्री गणेश पुष्प समर्पण मन्त्र

यथा–प्राप्त–ऋतु–पुष्पैः बिल्व–तुलसी–दलैश्च।
पूजयामि गणपते! प्रसीद मे सुरेश्वर!

॥श्रीगणेश–देवाय पुष्पं समर्पयामि॥

मन्त्र अर्थ – हे गणपते! ऋतु के अनुसार प्राप्त पुष्पों और विल्व तथा तुलसी-दलों से मैं आपकी पूजा करता हूँ। हे देवेश्वर! मुझ पर आप प्रसन्न हों।

॥ भगवान श्रीगणेश के लिये पुष्प समर्पित करता हूँ ॥

धूप-समर्पणम्

अब निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये श्री गणेश जी को धुप अर्पित करें।

श्री गणेश धूप समर्पण मन्त्र

वनस्पति–रसोद्भूतो गन्धाढ्यः सुमनोहरः।
आघ्रेयः सर्व–देवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥

॥श्रीगणेश–देवाय नमः धूपम् आघ्रापयामि॥

मन्त्र अर्थ – वृक्षों के रस से निर्मित, सुन्दर, मनोहर, सुगन्धित तथा सभी देवताओं के सूँघने के योग्य यह धूप आप ग्रहण करें।

॥ भगवान् श्रीगणेश के लिये मैं धूप समर्पित करता हूँ ॥

दीप-समर्पणम्

धुप अर्पित करने के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये भगवान गणेश को दीप अर्पित करें।

श्री गणेश दीप समर्पण मन्त्र

साज्यं त्रिवर्ति–संयुक्तं वह्निना योजितं मया,
दीपं गृहाण देवेश! त्रैलोक्य–तिमिरापहम्।
भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने।
त्राहि मां नरकात् घोराद्दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥

॥श्रीगणेश–देवाय नमः दीपं दर्शयामि॥

मन्त्र अर्थ – हे देवेश्वर! घी के सहित और बत्ती से मेरे द्वारा जलाया हुआ, तीनों लोकों के अँधेरे को दूर करने वाला दीपक स्वीकार करें। मैं भक्ति-पूर्वक परमात्मा भगवान् को दीपक प्रदान करता हूँ। इस दीपक को स्वीकार करें और घोर नरक से मेरी रक्षा करें।

॥ भगवान् श्रीगणेश के लिये मैं दीपक समर्पित करता हूँ ॥

नैवेद्य-समर्पणम्

अब निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये गणेश जी को नैवेद्य अर्पित करें।

श्री गणेश नैवेद्य समर्पण मन्त्र

शर्करा–खण्ड–खाद्यानि दधि–क्षीर–घृतानि च।
आहारो भक्ष्य–भोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्।

॥ श्रीगणेश–देवाय नमः यथांशतः श्रीगणेश–देवाय नैवेद्यं समर्पयामि।
ॐ प्राणाय स्वाहा। ॐ अपानाय स्वाहा।
ॐ समानाय स्वाहा। ॐ उदानाय स्वाहा।
ॐ व्यानाय स्वाहा॥

मन्त्र अर्थ – शर्करा-खण्ड (बताशा आदि), खाद्य पदार्थ, दही, दूध और घी जैसी खाद्य वस्तुओं से युक्त भोजन आप ग्रहण करें।

॥यथा-योग्य रूप भगवान् श्री गणेश को मैं नैवेद्य समर्पित करता हूँ – प्राण के लिये, अपान के लिये, समान के लिये, उदान के लिये और व्यान के लिये स्वीकार हो॥

नैवेद्य-समर्पणम्

अब निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये गणेश जी को नैवेद्य अर्पित करें।

श्री गणेश नैवेद्य समर्पण मन्त्र

शर्करा–खण्ड–खाद्यानि दधि–क्षीर–घृतानि च।
आहारो भक्ष्य–भोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्।

॥ श्रीगणेश–देवाय नमः यथांशतः श्रीगणेश–देवाय नैवेद्यं समर्पयामि।
ॐ प्राणाय स्वाहा। ॐ अपानाय स्वाहा।
ॐ समानाय स्वाहा। ॐ उदानाय स्वाहा।
ॐ व्यानाय स्वाहा॥

मन्त्र अर्थ – शर्करा-खण्ड (बताशा आदि), खाद्य पदार्थ, दही, दूध और घी जैसी खाद्य वस्तुओं से युक्त भोजन आप ग्रहण करें।

॥यथा-योग्य रूप भगवान् श्री गणेश को मैं नैवेद्य समर्पित करता हूँ – प्राण के लिये, अपान के लिये, समान के लिये, उदान के लिये और व्यान के लिये स्वीकार हो॥

आचमन-समर्पणम्/जल-समर्पणम्

अब निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये गणेश जी को आचमन हेतु जल अर्पित करें।

श्री गणेश आचमन समर्पण मन्त्र

ततः पानीयं समर्पयामि इति उत्तरापोषणम्।
हस्त–प्रक्षालनं समर्पयामि। मुख–प्रक्षालनम्।
करोद्वर्तनार्थे चन्दनं समर्पयामि।

मन्त्र अर्थ – नैवेद्य के उपरान्त मैं पीने और आचमन (उत्तरा-पोशन) के लिये, हाथ धोने के लिये, मुख धोने के लिये जल और हाथों में लगाने के लिये चन्दन समर्पित करता हूँ।

ताम्बूल-समर्पणम्

आचमन के पश्चात् भगवान गणेश को ताम्बूल (सुपारी युक्त पान) अर्पित करें।

श्री गणेश ताम्बूल समर्पण मन्त्र

पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम्।
कर्पूरैलासमायुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम्॥

॥श्रीगणेश–देवाय नमः मुखवासार्थं पूगीफल–युक्तं ताम्बूलं समर्पयामि॥

मन्त्र अर्थ – पान के पत्तों से युक्त अत्यन्त सुन्दर सुपारी, कपूर और इलायची से प्रस्तुत ताम्बूल आप स्वीकार करें।

॥ भगवान् श्रीगणेश के मुख को सुगन्धित करने के लिये सुपारी से युक्त ताम्बूल मैं समर्पित करता हूँ ॥

दक्षिणा

अब निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये गणेश जी को दक्षिणा अथवा भेंट-उपहार अर्पित करें।

श्री गणेश दक्षिणा मन्त्र

हिरण्यगर्भ–गर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः।
अनन्तपुण्य–फलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥

॥श्रीगणेश–देवाय नमः सुवर्ण–पुष्प–दक्षिणां समर्पयामि॥

मन्त्र अर्थ – असीम पुण्य प्रदान करनेवाले स्वर्ण-गर्भित चम्पक पुष्प से मुझे शान्ति प्रदान करिये।

॥ भगवान् श्रीगणेश के लिये मैं स्वर्ण-पुष्प-रुपी दक्षिणा प्रदान करता हूँ ॥

प्रदक्षिणा

अब गणेश जी की बायीं ओर से दायीं ओर की दिशा में घूमकर प्रतीकात्मक प्रदक्षिणा करें।

श्री गणेश प्रदक्षिणा मन्त्र

यानि कानि च पापानि जन्मान्तर–कृतानि च।
तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिणां पदे पदे॥
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं प्रभो!
तस्मात् कारुण्य–भावेन क्षमस्व परमेश्वर॥

॥श्रीगणेश–देवाय नमः प्रदक्षिणां समर्पयामि॥

मन्त्र अर्थ – पिछले जन्मों में जो भी पाप किये होते हैं, वे सब प्रदक्षिणा करते समय एक-एक पग पर क्रमशः नष्ट होते जाते हैं। हे प्रभो! मेरे लिये कोई अन्य शरण देने वाला नहीं है, तुम्हीं शरण-दाता हो। अतः हे परमेश्वर! दया-भाव से मुझे क्षमा करो।

॥ भगवान् श्रीगणेश को मैं प्रदक्षिणा समर्पित करता हूँ ॥

वन्दना-सहित-पुष्पाञ्जलिः

निम्नलिखित मन्त्र का जाप से गणेश जी की वन्दना करते हुये पुष्प अर्पित करें।

श्री गणेश वन्दना-सहित पुष्पाञ्जलि मन्त्र

करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा,
श्रवण–नयनजं वा मानसं वाऽपराधम्।
विदितमविदितं वा सर्वमेतत् क्षमस्व,
जय जय करुणाब्धे श्रीगणपते! त्राहि।

॥श्रीगणेश–देवाय नमः मन्त्र–पुष्पं समर्पयामि॥

मन्त्र अर्थ – हे दया-सागर, श्रीगणपते! हाथों-पैरों द्वारा किये हुए या शरीर या कर्म से उत्पन्न, कानों-आँखों से उत्पन्न या मन के जो भी ज्ञात या अज्ञात मेरे अपराध हों, उन सबको आप क्षमा करें। आपकी जय हो, जय हो। मेरी रक्षा करें।

॥ भगवान् श्रीगणेश के लिये मैं मन्त्र-पुष्पांजलि समर्पित करता हूँ ॥

साष्टाङ्ग-प्रणामः

श्री गणेश वन्दना के पश्चात् भगवान गणेश को साष्टङ्ग प्रणाम अर्थात् आठ अङ्गों द्वारा प्रणाम करें।

श्री गणेश साष्टाङ्ग प्रणाम मन्त्र

नमः सर्व–हितार्थाय जगदाधार–हेतवे।
साष्टाङ्गोऽयं सुप्रणामः प्रयत्नेन मया कृतः॥
नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्र–मूर्तये सहस्र–पादाक्षि–शिरोरु–बाहवे।

॥श्रीगणेश–देवाय नमः साष्टाङ्ग–प्रणामं समर्पयामि॥

मन्त्र अर्थ – सभी का कल्याण करनेवाले, जगत् के आधारभूत आपके लिये मैंने प्रयत्न-पूर्वक यह साष्टाङ्ग प्रणाम किया है – अनन्त भगवान् के लिये, सहस्रों स्वरुप वाले भगवान् के लिये, सहस्रों पैर-आँख-शिर-ऊरू एवं बाहु वाले भगवान् को नमस्कार है।

क्षमा-प्रार्थना

निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये पूजा के मध्य हुये समस्त ज्ञात-अज्ञात पाप कर्मों के लिये गणेश जी के समक्ष क्षमा-याचना करें।

श्री गणेश क्षमा प्रार्थना मन्त्र

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजाकर्म न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर!
मया यत्पूजितं देव! परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर।
विधेहि देव! कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपो–यज्ञ–क्रियादिषु।
नूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्॥
अनेन यथा–मिलितोपचार–द्रव्यैः कृत–पूजनेन श्रीगणेशदेवः प्रीयताम्।

॥श्रीगणेश–देवार्पणमस्तु॥

मन्त्र अर्थ – न मैं आवाहन करना जानता हूँ, न विसर्जन करना। पूजा-कर्म भी मैं नहीं जानता। हे परमेश्वर! मुझे क्षमा करो॥१॥ मन्त्र, क्रिया और भक्ति से रहित जो कुछ पूजा मैंने की है, हे भगवन्! वह मेरी पूजा सम्पूर्ण हो। मैं रात-दिन सहस्रों अपराध किया करता हूँ। “मैं दास हूँ” – ऐसा मानकर, हे परमेश्वर! मुझे क्षमा करें। हे भगवन्! मुझे रूप, विजय और यश दें। मेरे शत्रुओं का नाश करें।

तपस्या और यज्ञादि क्रियाओं में जिनके नाम का स्मरण और उच्चारण करने से सारी कमी तुरन्त पूरी हो जाती है, मैं उन अच्युत भगवान् की वन्दना करता हूँ।

यथा-सम्भव प्राप्त उपचार-वस्तुओं से मैंने जो यह पूजन किया है, उससे भगवान् श्री गणेश प्रसन्न हों।

॥ भगवान् श्रीगणेश को यह सब पूजन समर्पित है ॥

रक्षा-मन्त्रः

क्षमा-याचना के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये भगवान गणेश से षोडशोपचार पूजा के उपरान्त अपनी सुरक्षा हेतु प्रार्थना करें।

श्री गणेश रक्षा मन्त्र

ॐ रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष! रक्ष त्रैलोक्य–रक्षक!
भक्तानामभयं कर्त्ता! त्राता भव भवार्णवात्।

॥अनेन पूजनेन श्रीगणेशः ऋद्धि–सिद्धि–सहितः प्रीयताम्, नमो नमः॥

मन्त्र अर्थ -हे गण-समूहों के अध्यक्ष! मेरी रक्षा करिये, रक्षा करिये। हे तीनों लोकों के रक्षक! मेरी रक्षा करिये। हे भक्तों को निर्भय करनेवाले! संसार-सागर से मेरी रक्षा करनेवाले हों।

॥ इस पूजन से ऋद्धि और सिद्धि के सहित भगवान् गणेश प्रसन्न हों, उन्हें बारम्बार प्रणाम है॥

लक्ष्मी पूजा विधि

हम दीवाली के दौरान लक्ष्मी पूजा विधि को विस्तृत रूप से उपलब्ध करा रहे हैं। दीवाली पूजा के लिये लोगों को महा-लक्ष्मी की नवीन प्रतिमा खरीदनी चाहिये। यह पूजा विधि श्री लक्ष्मी की नवीन प्रतिमा या मूर्ति के लिये प्रदान की गयी है। इस पूजा विधि में लक्ष्मीजी की पूजा करने के लिये सोलह चरण सम्मिलित हैं, इसीलिये यह षोडशोपचार पूजा के नाम से प्रसिद्ध है।

ध्यानम्

भगवती लक्ष्मी का ध्यान पहले से अपने सम्मुख प्रतिष्ठित श्रीलक्ष्मी की नवीन प्रतिमा में करें।

श्री लक्ष्मी ध्यान मन्त्र

या सा पद्मासनस्था विपुल–कटि–तटी पद्म–पत्रायताक्षी।
गम्भीरार्तव–नाभिः स्तन–भर–नमिता शुभ्र–वस्त्रोत्तरीया॥
या लक्ष्मीर्दिव्य–रूपैर्मणि–गण–खचितैः स्वापिता हेम–कुम्भैः।
सा नित्यं पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्व–माङ्गल्य–युक्ता॥

मन्त्र अर्थ – भगवती लक्ष्मी कमल के आसन पर विराजमान हैं, कमल की पँखुड़ियों के समान सुन्दर बड़े-बड़े जिनके नेत्र हैं, जिनकी विस्तृत कमर और गहरे आवर्तवाली नाभि है, जो पयोधरों के भार से झुकी हुयी तथा सुन्दर वस्त्र के उत्तरीय से सुशोभित हैं, जो मणि-जटित दिव्य स्वर्ण-कलशों के द्वारा स्नान किये हुये हैं, वे कमल-हस्ता सदा सभी मङ्गलों के सहित मेरे घर में निवास करें।

आवाहनम्

श्रीभगवती लक्ष्मी का ध्यान करने के उपरान्त, निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी की प्रतिमा के सम्मुख आवाहन-मुद्रा प्रदर्शित करते हुये उनका आवाहन करें।ें।

श्री लक्ष्मी आवाहन मन्त्र

आगच्छ देवि देवेशि! तेजोमयि महा–लक्ष्मि!
क्रियमाणां मया पूजां गृहाण सुरवन्दिते!

॥ श्रीलक्ष्मी–देवीम् आवाहयामि ॥

मन्त्र अर्थ – हे देवताओं की ईश्वरि! तेज-मयी हे महा-देवि लक्ष्मि! देव-वन्दिते! आइये, मेरे द्वारा की जाने वाली पूजा को स्वीकार करें।

॥ मैं भगवती श्रीलक्ष्मी का आवाहन करता हूँ ॥

पुष्पाञ्जलि-आसनम्

आवाहन करने के उपरान्त निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करके देवी के आसन के लिये पाँच पुष्प अञ्जलि में लेकर अपने सामने छोड़े।

श्री लक्ष्मी पुष्पाञ्जलि मन्त्र

नाना–रत्न–समायुक्तं कार्त–स्वर–विभूषितम्।
आसनं देवि देवेशि! प्रीत्यर्थं प्रतिगृह्यताम्॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै आसनार्थे पञ्च–पुष्पाणि समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – हे देवताओं की ईश्वरि! विविध प्रकार के रत्नों से युक्त स्वर्ण-सज्जित आसन को प्रसन्नता हेतु ग्रहण करें।

॥ भगवती श्रीलक्ष्मी के आसन के लिये मैं पाँच पुष्प अर्पित करता हूँ ॥

स्वागतम्

पुष्पाञ्जलि-रूप आसन प्रदान करने के उपरान्त, निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये हाथ जोड़कर देवी श्रीलक्ष्मी का स्वागत करें।

श्री लक्ष्मी स्वागत मन्त्र

श्रीलक्ष्मी–देवि! स्वागतम्।

मन्त्र अर्थ – हे देवी, लक्ष्मि! आपका स्वागत है।

पाद्यम्

स्वागत करने के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र से पाद्य (चरण धोने हेतु जल) समर्पित करें।

श्री लक्ष्मी पाद्य मन्त्र

पाद्यं गृहाण देवेशि सर्व–क्षेम–समर्थे भोः!
भक्त्या समर्पितं देवि महालक्ष्मि! नमोऽस्तु ते॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः पाद्यं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – सभी प्रकार के कल्याण करने में समर्थ हे देवेश्वरि! चरण धोने का जल भक्ति-पूर्वक समर्पित है, स्वीकार करें। हे महा-देवि, लक्ष्मि! आपको नमस्कार है।

॥ भगवती श्रीलक्ष्मी को चरण धोने के लिये यह जल है – उन्हें नमस्कार ॥

अर्घ्यम्

पाद्य समर्पण के उपरान्त उन्हें अर्घ्य (शिर के अभिषेक हेतु जल) समर्पित करें।

श्री लक्ष्मी अर्घ्य मन्त्र

नमस्ते देवि देवेशि! नमस्ते कमल–धारिणि!
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते।
गन्ध–पुष्पाक्षतैर्युक्तं फल–द्रव्य–समन्वितम्।
गृहाण तोयमर्घ्यर्थं परमेश्वरि वत्सले!

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः अर्घ्यं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – हे श्री लक्ष्मि! आपको नमस्कार। हे कमल को धारण करनेवाली देव-देवेश्वरि! आपको नमस्कार। हे धनदा देवि, श्रीलक्ष्मि! आपको नमस्कार। शिर के अभिषेक के लिये यह जल (अर्घ्य) स्वीकार करें। हे कृपा-मयि परमेश्वरि! चन्दन-पुष्प-अक्षत से युक्त, फल और द्रव्य के सहित यह जल शिर के अभिषेक के लिये स्वीकार करें।

॥ भगवती श्रीलक्ष्मी के लिये अर्घ्य समर्पित है ॥

स्नानम्

अर्घ्य के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को जल से स्नान करायें।

श्री लक्ष्मी स्नान मन्त्र

गङ्गासरस्वतीरेवापयोष्णीनर्मदाजलैः।
स्नापितासि मया देवि तथा शान्तिं कुरुष्व मे॥
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः!

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः जलस्नानं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – 

॥ भगवती श्रीलक्ष्मी के स्नान के लिये जल समर्पित है ॥

पञ्चामृत-स्नानम्

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को पञ्चामृत से स्नान करायें।

श्री लक्ष्मी पञ्चामृत स्नान मन्त्र

दधि मधु घृतञ्चैव पयश्च शर्करायुतम्।
पञ्चामृतं समानीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥
ॐ पञ्चनद्यः सरस्वतीमपियन्ति सस्रोतसः।
सरस्वती तु पञ्चधा सोदेशे भवत् सरित्॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – हे गणपते! ऋतु के अनुसार प्राप्त पुष्पों और विल्व तथा तुलसी-दलों से मैं आपकी पूजा करता हूँ। हे देवेश्वर! मुझ पर आप प्रसन्न हों।

॥ भगवान श्रीगणेश के लिये पुष्प समर्पित करता हूँ ॥

गन्ध-स्नानम्

तदुपरान्त निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को गन्ध मिश्रित जल से स्नान करायें।

श्री लक्ष्मी गन्ध स्नान मन्त्र

ॐ मलयाचलसम्भूतं चन्दनागरुसम्भवम्।
चन्दनं देवि देवेशि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः गन्धस्नानं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – वृक्षों के रस से निर्मित, सुन्दर, मनोहर, सुगन्धित तथा सभी देवताओं के सूँघने के योग्य यह धूप आप ग्रहण करें।

॥ भगवान् श्रीगणेश के लिये मैं धूप समर्पित करता हूँ ॥

शुद्ध-स्नानम्

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को शुद्ध जल से स्नान करायें।

श्री लक्ष्मी शुद्ध स्नान मन्त्र

मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम्।
तदिदं कल्पितं तुभ्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – हे देवेश्वर! घी के सहित और बत्ती से मेरे द्वारा जलाया हुआ, तीनों लोकों के अँधेरे को दूर करने वाला दीपक स्वीकार करें। मैं भक्ति-पूर्वक परमात्मा भगवान् को दीपक प्रदान करता हूँ। इस दीपक को स्वीकार करें और घोर नरक से मेरी रक्षा करें।

॥ भगवान् श्रीगणेश के लिये मैं दीपक समर्पित करता हूँ ॥

वस्त्रम्

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को मोली के रूप में वस्त्र समर्पित करें।

श्री लक्ष्मी वस्त्र मन्त्र

दिव्याम्बरं नूतनं हि क्षौमं त्वतिमनोहरम्।
दीयमानं मया देवि गृहाण जगदम्बिके॥
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतो सुराष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः वस्त्रं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – शर्करा-खण्ड (बताशा आदि), खाद्य पदार्थ, दही, दूध और घी जैसी खाद्य वस्तुओं से युक्त भोजन आप ग्रहण करें।

॥यथा-योग्य रूप भगवान् श्री गणेश को मैं नैवेद्य समर्पित करता हूँ – प्राण के लिये, अपान के लिये, समान के लिये, उदान के लिये और व्यान के लिये स्वीकार हो॥

मधुपर्कम्

श्री लक्ष्मी को दूध व शहद का मिश्रण अर्थात् मधुपर्क अर्पित करें।

श्री लक्ष्मी मधुपर्क मन्त्र

ॐ कापिलं दधि कुन्देन्दुधवलं मधुसंयुतम्।
स्वर्णपात्रस्थितं देवि मधुपर्कं गृहाण भोः॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः मधुपर्कं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – शर्करा-खण्ड (बताशा आदि), खाद्य पदार्थ, दही, दूध और घी जैसी खाद्य वस्तुओं से युक्त भोजन आप ग्रहण करें।

॥यथा-योग्य रूप भगवान् श्री गणेश को मैं नैवेद्य समर्पित करता हूँ – प्राण के लिये, अपान के लिये, समान के लिये, उदान के लिये और व्यान के लिये स्वीकार हो॥

आभूषणम्

मधुपर्क के उपरान्त निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये आभूषण अर्पित करें।

श्री लक्ष्मी आभूषण मन्त्र

रत्नकङ्कण–वैदूर्यमुक्ताहारयुतानि च।
सुप्रसन्नेन मनसा दत्तानि स्वीकुरुष्व मे॥
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वान्निर्णुद मे गृहात्॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः आभूषणानि समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – नैवेद्य के उपरान्त मैं पीने और आचमन (उत्तरा-पोशन) के लिये, हाथ धोने के लिये, मुख धोने के लिये जल और हाथों में लगाने के लिये चन्दन समर्पित करता हूँ।

रक्तचन्दनम्

आभूषण अर्पण के उपरान्त निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को लाल चन्दन अर्पित करें।

श्री लक्ष्मी रक्तचन्दन मन्त्र

ॐ रक्तचन्दनसम्मिश्रं पारिजातसमुद्भवम्।
मया दत्तं गृहाणाशु चन्दनं गन्धसंयुतम्॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः आभूषणानि समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – पान के पत्तों से युक्त अत्यन्त सुन्दर सुपारी, कपूर और इलायची से प्रस्तुत ताम्बूल आप स्वीकार करें।

॥ भगवान् श्रीगणेश के मुख को सुगन्धित करने के लिये सुपारी से युक्त ताम्बूल मैं समर्पित करता हूँ ॥

सिन्दूरम्

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को तिलक के लिये सिन्दूर अर्पित करें।

श्री लक्ष्मी सिन्दुर मन्त्र

ॐ सिन्दूरं रक्तवर्णञ्च सिन्दूरतिलकप्रिये।
भक्त्या दत्तं मया देवि सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम्॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः सिन्दूरं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – असीम पुण्य प्रदान करनेवाले स्वर्ण-गर्भित चम्पक पुष्प से मुझे शान्ति प्रदान करिये।

॥ भगवान् श्रीगणेश के लिये मैं स्वर्ण-पुष्प-रुपी दक्षिणा प्रदान करता हूँ ॥

कुङ्कुमम्

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को अखण्ड सौभाग्य रूपी कुङ्कुम अर्पित करें।

श्री लक्ष्मी कुङ्कुम स्नान मन्त्र

ॐ कुङ्कुमं कामदं दिव्यं कुङ्कुमं कामरूपिणम्।
अखण्डकामसौभाग्यं कुङ्कुमं प्रतिगृह्यताम्॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः कुङ्कुमं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – पिछले जन्मों में जो भी पाप किये होते हैं, वे सब प्रदक्षिणा करते समय एक-एक पग पर क्रमशः नष्ट होते जाते हैं। हे प्रभो! मेरे लिये कोई अन्य शरण देने वाला नहीं है, तुम्हीं शरण-दाता हो। अतः हे परमेश्वर! दया-भाव से मुझे क्षमा करो।

॥ भगवान् श्रीगणेश को मैं प्रदक्षिणा समर्पित करता हूँ ॥

अबीर-गुलालम्

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को अबीरगुलाल अर्पित करें।

श्री लक्ष्मी-अबीर गुलाल मन्त्र

अबीरञ्च गुलालं च चोवा–चन्दनमेव च।
श्रृङ्गारार्थं मया दत्तं गृहाण परमेश्वरि॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः अबीरगुलालं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – हे दया-सागर, श्रीगणपते! हाथों-पैरों द्वारा किये हुए या शरीर या कर्म से उत्पन्न, कानों-आँखों से उत्पन्न या मन के जो भी ज्ञात या अज्ञात मेरे अपराध हों, उन सबको आप क्षमा करें। आपकी जय हो, जय हो। मेरी रक्षा करें।

॥ भगवान् श्रीगणेश के लिये मैं मन्त्र-पुष्पांजलि समर्पित करता हूँ ॥

सुगन्धित-द्रव्यम्

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को सुगन्धित द्रव्य अर्पित करें।

श्री लक्ष्मी सुगन्धित द्रव्य मन्त्र

ॐ तैलानि च सुगन्धीनि द्रव्याणि विविधानि च।
मया दत्तानि लेपार्थं गृहाण परमेश्वरि॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः सुगन्धिततैलं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – सभी का कल्याण करनेवाले, जगत् के आधारभूत आपके लिये मैंने प्रयत्न-पूर्वक यह साष्टाङ्ग प्रणाम किया है – अनन्त भगवान् के लिये, सहस्रों स्वरुप वाले भगवान् के लिये, सहस्रों पैर-आँख-शिर-ऊरू एवं बाहु वाले भगवान् को नमस्कार है।

अक्षताः

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को अक्षत अर्पित करें।

श्री लक्ष्मी अक्षत मन्त्र

अक्षताश्च सुरश्रेष्ठे कुङ्कुमाक्ताः सुशोभिताः।
मया निवेदिता भक्त्या पूजार्थं प्रतिगृह्यताम्॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः अक्षतान् समर्पयामि ॥

॥ भगवती श्रीलक्ष्मी के लिये अक्षत समर्पित करता हूँ ॥

मन्त्र अर्थ – न मैं आवाहन करना जानता हूँ, न विसर्जन करना। पूजा-कर्म भी मैं नहीं जानता। हे परमेश्वर! मुझे क्षमा करो॥१॥ मन्त्र, क्रिया और भक्ति से रहित जो कुछ पूजा मैंने की है, हे भगवन्! वह मेरी पूजा सम्पूर्ण हो। मैं रात-दिन सहस्रों अपराध किया करता हूँ। “मैं दास हूँ” – ऐसा मानकर, हे परमेश्वर! मुझे क्षमा करें। हे भगवन्! मुझे रूप, विजय और यश दें। मेरे शत्रुओं का नाश करें।

तपस्या और यज्ञादि क्रियाओं में जिनके नाम का स्मरण और उच्चारण करने से सारी कमी तुरन्त पूरी हो जाती है, मैं उन अच्युत भगवान् की वन्दना करता हूँ।

यथा-सम्भव प्राप्त उपचार-वस्तुओं से मैंने जो यह पूजन किया है, उससे भगवान् श्री गणेश प्रसन्न हों।

॥ भगवान् श्रीगणेश को यह सब पूजन समर्पित है ॥

गन्ध-समर्पणम्/चन्दन-समर्पणम्

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को चन्दन समर्पित करें।

श्री लक्ष्मी गन्ध समर्पण मन्त्र

श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्।
विलेपनं महालक्ष्मि! चन्दनं प्रति–गृह्यताम्॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः चन्दनं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – हे महा-लक्ष्मि! मनोहर और सुगन्धित चन्दन शरीर में लगाने हेतु ग्रहण करें।

॥ भगवती श्रीलक्ष्मी के लिये चन्दन समर्पित करता हूँ ॥

पुष्प-समर्पणम्

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को पुष्प समर्पित करें।

श्री लक्ष्मी पुष्प समर्पण मन्त्र

यथाप्राप्त–ऋतुपुष्पैः बिल्व–तुलसी–दलैरपि।
पूजयामि महा–लक्ष्मि! प्रसीद मे सुरेश्वरि!

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः पुष्पं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – हे महा-लक्ष्मि! ऋतु के अनुसार प्राप्त पुष्पों और विल्व तथा तुलसी-दलों से मैं आपकी पूजा करता हूँ।

॥ भगवती श्रीलक्ष्मी के लिये पुष्प समर्पित करता हूँ ॥

अङ्ग-पूजनम्

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये भगवती लक्ष्मी के अङ्ग-देवताओं का पूजन करना चाहिये। बायें हाथ में चावल, पुष्प व चन्दन लेकर प्रत्येक मन्त्र का उच्चारण करते हुये दाहिने हाथ से श्री लक्ष्मी की मूर्ति के पास छोड़ें।

श्री लक्ष्मी अङ्ग पूजन मन्त्र

ॐ चपलायै नमः पादौ पूजयामि।
ॐ चञ्चलायै नमः जानुनी पूजयामि।
ॐ कमलायै नमः कटिं पूजयामि।
ॐ कात्यायन्यै नमः नाभिं पूजयामि।
ॐ जगन्मात्रे नमः जठरं पूजयामि।
ॐ विश्व–वल्लभायै नमः वक्ष–स्थलं पूजयामि।
ॐ कमल–वासिन्यै नमः हस्तौ पूजयामि।
ॐ कमल–पत्राक्ष्यै नमः नेत्र–त्रयं पूजयामि।
ॐ श्रियै नमः शिरः पूजयामि।

मन्त्र अर्थ – हे महा-लक्ष्मि! ऋतु के अनुसार प्राप्त पुष्पों और विल्व तथा तुलसी-दलों से मैं आपकी पूजा करता हूँ।

॥ भगवती श्रीलक्ष्मी के लिये पुष्प समर्पित करता हूँ ॥

अष्ट-सिद्धि पूजा

अङ्ग-देवताओं की पूजा करने के उपरान्त पुनः बायें हाथ में चन्दन, पुष्प व चावल लेकर दायें हाथ से भगवती लक्ष्मी की मूर्ति के समीप ही अष्ट-सिद्धियों की पूजा करें।

श्री लक्ष्मी अष्ट सिद्धि मन्त्र

ॐ अणिम्ने नमः। ॐ महिम्ने नमः।
ॐ गरिम्णे नमः। ॐ लघिम्ने नमः।
ॐ प्राप्त्यै नमः। ॐ प्राकाम्यै नमः।
ॐ ईशितायै नमः। ॐ वशितायै नमः।

मन्त्र अर्थ – हे महा-लक्ष्मि! ऋतु के अनुसार प्राप्त पुष्पों और विल्व तथा तुलसी-दलों से मैं आपकी पूजा करता हूँ।

॥ भगवती श्रीलक्ष्मी के लिये पुष्प समर्पित करता हूँ ॥

अष्ट-लक्ष्मी पूजा

अष्ट-सिद्धियों की पूजा के उपरान्त उपर्युक्त विधि से भगवती लक्ष्मी की मूर्ति के समीप ही अष्ट-लक्ष्मियों की पूजा चावल, चन्दन तथा पुष्प से करें।

श्री अष्ट लक्ष्मी मन्त्र

ॐ आद्य–लक्ष्म्यै नमः। ॐ विद्या–लक्ष्म्यै नमः।
ॐ सौभाग्य–लक्ष्म्यै नमः। ॐ अमृत–लक्ष्म्यै नमः।
ॐ कमलाक्ष्यै नमः। ॐ सत्य–लक्ष्म्यै नमः।
ॐ भोग–लक्ष्म्यै नमः। ॐ योग–लक्ष्म्यै नमः।

मन्त्र अर्थ – हे महा-लक्ष्मि! ऋतु के अनुसार प्राप्त पुष्पों और विल्व तथा तुलसी-दलों से मैं आपकी पूजा करता हूँ।

॥ भगवती श्रीलक्ष्मी के लिये पुष्प समर्पित करता हूँ ॥

धूप-समर्पणम्

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को धूप समर्पित करें।

श्री लक्ष्मी धूप समर्पण मन्त्र

वनस्पति–रसोद्भूतो गन्धाढ्यः सुमनोहरः।
आघ्रेयः सर्व–देवानां, धूपोऽयं प्रति–गृह्यताम्॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः धूपं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – वृक्षों के रस से निर्मित, सुन्दर, मनोहर, सुगन्धित और सभी देवताओं के सूँघने के योग्य यह धूप आप ग्रहण करें।

॥ भगवती श्रीलक्ष्मी के लिये मैं धूप समर्पित करता हूँ ॥

दीप-समर्पणम्

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को दीप समर्पित करें।

श्री लक्ष्मी दीप समर्पण मन्त्र

साज्यं त्रिवर्ति–संयुक्तं वह्निना योजितं मया,
दीपं गृहाण देवेशि! त्रैलोक्य–तिमिरापहम्।
भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देव्यै परमात्मने।
त्राहि मां नरकात् घोरात् दीपोऽयं प्रति–गृह्यताम्॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः दीपं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – हे देवेश्वरि! घी के सहित और बत्ती से मेरे द्वारा जलाया हुआ, तीनों लोकों के अँधेरे को दूर करने वाला दीपक स्वीकार करें। मैं भक्ति-पूर्वक परात्परा श्रीलक्ष्मी-देवी को दीपक प्रदान करता हूँ। इस दीपक को स्वीकार करें और घोर नरक से मेरी रक्षा करें।

॥ भगवती श्रीलक्ष्मी के लिये मैं दीपक समर्पित करता हूँ ॥

नैवेद्य-समर्पणम्

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को नैवेद्य समर्पित करें।

श्री लक्ष्मी नैवेद्य समर्पण मन्त्र

शर्करा–खण्ड–खाद्यानि दधि–क्षीर–घृतानि च।
आहारो भक्ष्य–भोज्यं च नैवेद्यं प्रति–गृह्यताम्।

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः यथांशतः श्रीलक्ष्मी–देव्यै नैवेद्यं समर्पयामि –
ॐ प्राणाय स्वाहा। ॐ अपानाय स्वाहा।
ॐ समानाय स्वाहा। ॐ उदानाय स्वाहा।
ॐ व्यानाय स्वाहा ॥

मन्त्र अर्थ – शर्करा-खण्ड (बताशा आदि), खाद्य पदार्थ, दही, दूध और घी जैसी खाने की वस्तुओं से युक्त भोजन आप ग्रहण करें।

॥ यथा-योग्य रूप भगवती श्रीलक्ष्मी को मैं नैवेद्य समर्पित करता हूँ – प्राण के लिये, अपान के लिये, समान के लिये, उदान के लिये और व्यान के लिये स्वीकार हो ॥

आचमन-समर्पणम्/जल-समर्पणम्

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये आचमन के लिये श्रीलक्ष्मी को जल समर्पित करें।

श्री लक्ष्मी आचमन मन्त्र

ततः पानीयं समर्पयामि इति उत्तरापोषणम्।
हस्त–प्रक्षालनं समर्पयामि। मुख–प्रक्षालनं।
करोद्वर्तनार्थे चन्दनं समर्पयामि।

मन्त्र अर्थ – नैवेद्य के पश्चात् मैं पीने और आचमन (उत्तरा-पोशन) के लिये, हाथ धोने के लिये, मुख धोने के लिये जल और हाथों में लगाने के लिये चन्दन समर्पित करता हूँ।

ताम्बूल-समर्पणम्

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को ताम्बूल (पान, सुपारी सहित) समर्पित करें।

श्री लक्ष्मी ताम्बूल समर्पण मन्त्र

पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्ली–दलैर्युतम्।
कर्पूरैला–समायुक्तं ताम्बूलं प्रति–गृह्यताम्॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः मुख–वासार्थं पूगी–फलयुक्तं ताम्बूलं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – पान के पत्तों से युक्त अत्यन्त सुन्दर सुपारी, कपूर और इलायची से प्रस्तुत ताम्बूल आप स्वीकार करें।

॥ भगवती श्रीलक्ष्मी के मुख को सुगन्धित करने के लिये सुपारी से युक्त ताम्बूल मैं समर्पित करता हूँ ॥

दक्षिणा

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को दक्षिणा समर्पित करें।

श्री लक्ष्मी दक्षिणा मन्त्र

हिरण्य–गर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः।
अनन्तपुण्य–फलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः सुवर्णपुष्प–दक्षिणां समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – असीम पुण्य प्रदान करने वाली स्वर्ण-गर्भित चम्पक पुष्प से मुझे शान्ति प्रदान करिये।

॥ भगवती श्रीलक्ष्मी के लिये मैं स्वर्ण-पुष्प-रूपी दक्षिणा प्रदान करता हूँ ॥

प्रदक्षिणा

अब श्रीलक्ष्मी की प्रदक्षिणा (बायें से दायें ओर की परिक्रमा) सहित निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को फूल समर्पित करें।

श्री लक्ष्मी प्रदक्षिणा मन्त्र

यानि कानि च पापानि जन्मान्तर–कृतानि च।
तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिणां पदे पदे॥
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम।
तस्मात् कारुण्य–भावेन, क्षमस्व परमेश्वरि॥

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः प्रदक्षिणां समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – पिछले जन्मों में जो भी पाप किये होते हैं, वे सब प्रदक्षिणा करते समय एक-एक पग पर क्रमशः नष्ट होते जाते हैं। हे देवि! मेरे लिये कोई अन्य शरण देनेवाला नहीं हैं, तुम्हीं शरण-दात्री हो। अतः हे परमेश्वरि! दया-भाव से मुझे क्षमा करो।

॥ भगवती श्री लक्ष्मी को मैं प्रदक्षिणा समर्पित करता हूँ ॥

वन्दना-सहित पुष्पाञ्जलिः

तदुपरान्त वन्दना करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को पुष्प समर्पित करें।

श्री लक्ष्मी वन्दना मन्त्र

करकृतं वा कायजं कर्मजं वा,
श्रवण–नयनजं वा मानसं वाऽपराधम्।
विदितमविदितं वा सर्वमेतत् क्षमस्व,
जय जय करुणाब्धे, श्रीमहा–लक्ष्मि त्राहि।

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः मन्त्र–पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – हे दया-सागर, श्रीलक्ष्मि! हाथों-पैरों द्वारा किये हुये या शरीर या कर्म से उत्पन्न, कानों-आँखों से उत्पन्न या मन के जो भी ज्ञात या अज्ञात मेरे अपराध हों, उन सबको आप क्षमा करें। आपकी जय हो, जय हो। मेरी रक्षा करें।

॥ भगवती श्रीलक्ष्मी के लिये मैं मन्त्र-पुष्पांजलि समर्पित करता हूँ ॥

वन्दना-सहित पुष्पाञ्जलिः

तदुपरान्त वन्दना करें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को पुष्प समर्पित करें।

श्री लक्ष्मी वन्दना मन्त्र

करकृतं वा कायजं कर्मजं वा,
श्रवण–नयनजं वा मानसं वाऽपराधम्।
विदितमविदितं वा सर्वमेतत् क्षमस्व,
जय जय करुणाब्धे, श्रीमहा–लक्ष्मि त्राहि।

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै नमः मन्त्र–पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि ॥

मन्त्र अर्थ – हे दया-सागर, श्रीलक्ष्मि! हाथों-पैरों द्वारा किये हुये या शरीर या कर्म से उत्पन्न, कानों-आँखों से उत्पन्न या मन के जो भी ज्ञात या अज्ञात मेरे अपराध हों, उन सबको आप क्षमा करें। आपकी जय हो, जय हो। मेरी रक्षा करें।

॥ भगवती श्रीलक्ष्मी के लिये मैं मन्त्र-पुष्पांजलि समर्पित करता हूँ ॥

साष्टाङ्ग-प्रणामः

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीलक्ष्मी को साष्टाङ्ग प्रणाम अर्थात् आठ अङ्गों के सहित प्रणाम कर नमस्कार करें।

श्री लक्ष्मी साष्टाङ्ग प्रणाम मन्त्र

ॐ भवानि! त्वं महा–लक्ष्मीः सर्व–काम–प्रदायिनी।
प्रसन्ना सन्तुष्टा भव देवि! लक्ष्म्यै नमोऽस्तु ते।

॥ अनेन पूजनेन श्रीलक्ष्मी देवी प्रीयतां नमो नमः॥

मन्त्र अर्थ – हे भवानी! आप सभी कामनाओं को देने वाली महा-लक्ष्मी हैं। हे देवि! आप प्रसन्न और सन्तुष्ट हों। आपको नमस्कार।

॥ इस पूजन से श्रीलक्ष्मी देवी प्रसन्न हों, उन्हें बारम्बार नमस्कार ॥

क्षमा-प्रार्थना

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये पूजा के समय हुयी किसी भी प्रकार की ज्ञात-अज्ञात त्रुटि के लिये श्रीलक्ष्मी से क्षमा-प्रार्थना करें।

श्री लक्ष्मी क्षमा प्रार्थना मन्त्र

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्॥
पूजा–कर्म न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्ति–हीनं सुरेश्वरि!
मया यत्पूजितं देवि! परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अनेन यथा–मिलितोपचार–द्रव्यैः कृत–पूजनेन श्रीलक्ष्मी–देवी प्रीयताम्

॥ श्रीलक्ष्मी–देव्यै अर्पणमस्तु ॥

मन्त्र अर्थ – न मैं आवाहन करना जानता हूँ, न विसर्जन करना। पूजा-कर्म भी मैं नहीं जानता। हे परमेश्वरि! मुझे क्षमा करो। मन्त्र, क्रिया और भक्ति से रहित जो कुछ पूजा मैंने की है, हे देवि! वह मेरी पूजा सम्पूर्ण हो।

यथा-सम्भव प्राप्त उपचार-वस्तुओं से मैंने जो यह पूजन किया है, उससे भगवती श्रीलक्ष्मी प्रसन्न हों।

॥ भगवती श्रीलक्ष्मी को यह समस्त पूजन समर्पित है ॥

काली पूजा विधि

दीवाली पूजा के समय, काली पूजा का विशेष महत्व होता है। दीवाली पूजा में की जाने वाली अन्य महत्वपूर्ण पूजाओं के अतिरिक्त सम्पूर्ण दीवाली पूजा विधि में काली पूजा भी सम्मिलित है। हालाँकि, भगवती काली की मूर्ति की पूजा करने के अतिरिक्त, लेखनी-दवात, अर्थात् कलम एवं स्याही की बोतल की पूजा भी स्वयं देवी काली के रूप में की जाती है। काली पूजा आरम्भ करने के लिये, लेखनी-दवात को पूजा स्थल पर स्थापित किया जाता है। अनामिका, अर्थात् दाहिने हाथ की अनामिका से उन पर स्वास्तिक चिह्न अङ्कित किया जाता है। स्वास्तिक की रचना, लाल चन्दन अथवा रोचना अथवा रोली के लेप से करनी चाहिये। लेखनी-दवात पर स्वास्तिक अङ्कित करने के पश्चात् ही, काली पूजा आरम्भ की जा सकती है।

ध्यानम्

सर्व प्रथम भगवती श्रीकाली का ध्यान किया जाना चाहिये। प्रतीकात्मक रूप से भगवती काली का प्रतिनिधित्व करने वाले लेखनी-दावात के समक्ष ध्यान करना चाहिये। भगवती काली का ध्यान करते हुये निम्नलिखित मन्त्र का जाप करना चाहिये। बंगाल में निशिता काल में काली पूजा की जाती है।

श्री काली ध्यान मन्त्र

ॐ सद्यश्छिन्नशिरः कृपाणमभयं हस्तैर्वरं बिभ्रतीं।
घोरास्यां शिरसां स्रजं सुरुचिरां उन्मुक्तकेशावलिम्॥
सृक्कासृक्प्रवहां श्मशाननिलयां श्रुत्योः शवालङ्कृतिं।
श्यामाङ्गीं कृत–मेखलां शव–करैर्देवीं भजे कालिकाम्॥

मन्त्र अर्थ – श्याम-वर्णा, खुले हुये सुन्दर केशोंवाली, हाथों में तुरन्त कटा हुआ मुण्ड, खड्ग, अभय एवं वरद्-मुद्रा-धारिणी, घोरानना, मुण्ड-माला-विभूषिता, ओष्ठ-प्रान्त से रक्त धारा प्रवाहित करती हुयी, कानों में शव-आभूषण-धारिणी, कमर में शव के हाथों की काञ्ची पहने हुयी, श्मशान-वासिनी भगवती कालिका की मैं वन्दना करता हूँ।

आवाहनम्

भगवती काली का ध्यान करने के पश्चात्, लेखनी-दावात के सम्मुख आवाहन-मुद्रा प्रदर्शित कर, निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये उनका आवाहन करें।

श्री काली आवाहन मन्त्र

ॐ देवेशि! भक्ति सुलभे! परिवारसमिन्वते!
यावत् त्वां पूजयिष्यामि तवात् त्वं सुस्थिरा भव॥
दुष्पारे घोर–संसार–सागरे पतितं सदा।
त्रायस्व वरदे देवि! नमस्ते चित्–परात्मिके॥
ये देवा याश्च देव्यश्च चलितायां चलन्ति हि।
आवाहयामि तान् सर्वान् कालिके परमेश्वरि॥
प्राणान् रक्ष यशो रक्ष रक्ष दारान् सुतान् धनम्।
सर्व–रक्षा–करी यस्मात् त्वं हि देवि जगन्मये॥
प्रविश्य तिष्ठ यज्ञेऽस्मिन् यावत् पूजां करोम्यहम्।
सर्वानन्द–करे देवि! सर्वसिद्धिं प्रयच्छ मे॥
तिष्ठात्र कालिके मातः! सर्व–कल्याण–हेतवे।
पूजां गृहाण सुमुखि! नमस्ते शङ्कर–प्रिये॥

॥ श्रीमहा–काली–देवीम् आवाहयामि॥

मन्त्र अर्थ – भक्ति से सहज ही कृपा करनेवाली, परिवार-सहित हे देवेशि! जब तक मैं आपकी पूजा करूँ, आप तब तक स्थिर होकर विराजमान रहें। कठिनाई से पार होनेवाले भयानक संसार-सागर में निरन्तर घिरे हुये मुझ पतित की हे देवि! रक्षा कीजिये। हे चित्-परात्मिके! आपको नमस्कार। हे परमेश्वरि, कालिके! जो देव और जो देवियाँ इस जगत् में सक्रिय हैं, उन सभी का मैं आवाहन करता हूँ। मेरे प्राणों की रक्षा कीजिये, यश की रक्षा कीजिये, स्त्रियों, पुत्रों और धन की रक्षा कीजिये, क्योंकि हे जगद्-व्यापिके, देवि! आप ही सबकी रक्षा करनेवाली हैं। जब तक मैं पूजा करता हूँ, इस यज्ञ में प्रवेश कर आप यहीं विराजिये। हे सर्वानन्द-कारिणि, देवि! मुझे आप सभी सिद्धियाँ प्रदान करें। हे माँ कालिके! समस्त प्रकार का कल्याण करने हेतु आप यहाँ ठहरिये तथा हे सुमुखि! मेरी पूजा को स्वीकार करें। हे शङ्कर-प्रिये! आपको नमस्कार है।

पुष्पाञ्जलि-आसनम्

आवाहन करने के उपरान्त, निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये भगवती काली के आसन के लिये पाँच पुष्प अञ्जलि में लेकर अपने समक्ष स्थापित लेखनी-दावात के निकट छोड़े।

श्री काली पुष्पाञ्जलि आसन मन्त्र

नाना–रत्न–समायुक्तं कार्तस्वर–विभूषितम्।
आसनं देवि देवेशि! प्रीत्यर्थं प्रतिगृह्यताम्॥

॥ श्रीमहा–काली–दैव्यै आसनार्थे पञ्च–पुष्पाणि समर्पयामि॥

मन्त्र अर्थ – हे देवताओं की इश्वरि! विविध प्रकार के रत्नों से युक्त, स्वर्ण-सज्जित आसन को प्रसन्नता हेतु ग्रहण करें।

॥ भगवती श्रीकाली के आसन के लिये मैं पाँच पुष्प अर्पित करता हूँ ॥

नवोपचार-पूजनम्

तत्पश्चात् ‘चन्दन-अक्षत-पुष्प-धूप-दीप-नैवेद्य’ द्वारा निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुये भगवती काली का पूजन करें।

श्री काली नवोपचार पूजन मन्त्र

ॐ श्रीकाली–देव्यै नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
ॐ श्रीकाली–देव्यै नमः शिरसि अर्घ्यं समर्पयामि।
ॐ श्रीकाली–देव्यै नमः गन्धाक्षतान् समर्पयामि।
ॐ श्रीकाली–देव्यै नमः पुष्पं समर्पयामि।
ॐ श्रीकाली–देव्यै नमः धूपम् आघ्रापयामि।
ॐ श्रीकाली–देव्यै नमः दीपं दर्शयामि।
ॐ श्रीकाली–देव्यै नमः नैवेद्यं निवेदयामि।
ॐ श्रीकाली–देव्यै नमः आचमनीयं समर्पयामि।
ॐ श्रीकाली–देव्यै नमः ताम्बूलं समर्पयामि।

मन्त्र अर्थ – तत्पश्चात् ‘चन्दन-अक्षत-पुष्प-धूप-दीप-नैवेद्य’ द्वारा निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुये भगवती काली का पूजन करें।

पूजन-समर्पणम्

इस प्रकार पूजन करने के पश्चात् बायें हाथ में गन्ध, अक्षत, पुष्प लेकर दाहिने हाथ द्वारा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये ‘लेखनी-दावात’ पर अर्पित कर दें।

श्री काली पूजन समर्पण मन्त्र

ॐ श्रीमहाकाल्यै नमः। अनेन पूजनेन श्रीकाली देवी प्रीयताम्। नमो नमः।

मन्त्र अर्थ – देवी महाकाली को नमस्कार है! इस पूजन से श्रीकाली देवी प्रसन्न हों, उन्हें बारम्बार प्रणाम है।

सरस्वती पूजा विधि

देवी सरस्वती को ज्ञान एवं कला की देवी माना जाता है। देवी सरस्वती की पूजा दीवाली पूजा, नवरात्रि सरस्वती पूजा और वसन्त पञ्चमी के दौरान की जाती है। गुजरात में, दीवाली के समय सरस्वती पूजा को शारदा पूजा एवं चोपड़ा पूजा के नाम से भी जाना जाता है।

सरस्वती पूजा प्रारम्भ करने के लिये, पूजा स्थल पर बही-खाते य अन्य पुस्तकें रखी जाती हैं। रोचन अथवा लाल चन्दन के मिश्रण से बही-खातों पर एक स्वस्तिक चिह्न बनाना चाहिये। बही-खातों पर स्वस्तिक चिह्न बनाने के पश्चात् सरस्वती पूजन प्रारम्भ कर सकते हैं।

ध्यानम्

पूजा के प्रारम्भ में भगवती सरस्वती का ध्यान करना चाहिये। देवी-सरस्वती का प्रतिनिधित्व करने वाले बही-खाते या पुस्तकों के सामने ध्यान किया जाना चाहिये। भगवती सरस्वती का ध्यान करते हुये निम्नलिखित मन्त्र का जाप करना चाहिये।

श्री सरस्वती ध्यान मन्त्र

या कुन्देन्दु–तुषार–हार–धवला या शुभ्र–वस्त्रावृता
या वीणा–वरदण्ड–मण्डित–करा या श्वेत–पद्मासना।
या ब्रह्माऽच्युत–शङ्कर–प्रभृतिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

मन्त्र अर्थ – जो कुन्द-पुष्प और हिम-माला के समान उज्जवल-वर्णा हैं, जो उज्जवल वस्त्र-धारिणी हैं, जो सुन्दर वीणा-दण्ड से सुशोभित कर-कमलोंवाली हैं और जो सदा ब्रह्मा-विष्णु-महेश आदि देवताओं द्वारा पूजनीय हैं, वे जड़ता को निर्मूल करने वाली भगवती सरस्वती मेरी रक्षा करें।

आवाहनम्

भगवती सरस्वती का ध्यान करने के उपरान्त बही-खाते या पुस्तकों आदि के सम्मुख आवाहन-मुद्रा प्रदर्शित करते हुये, निम्नलिखित मन्त्र द्वारा उनका आवाहन करें।

श्री सरस्वती आवाहन मन्त्र

आगच्छ देवि देवेशि! तेजोमयि सरस्वति!
क्रियमाणां मया पूजां गृहाण सुर–वन्दिते!

॥ श्रीसरस्वती–देवीम् आवाहयामि॥

मन्त्र अर्थ – हे देवताओं की ईश्वरी! तेज-मयी हे देवि, सरस्वति! हे देव-वन्दिते! आइये, मेरे द्वारा की जाने वाली पूजा को स्वीकार करें।

॥ मै भगवती सरस्वती का आवाहन करता हूँ ॥

पुष्पाञ्जलि-आसनम्

आवाहन करने के उपरान्त निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये भगवती सरस्वती के आसन के लिये पाँच पुष्प अञ्जलि में लेकर अपने सामने, बही-खाते या पुस्तकों आदि के निकट छोड़े।

श्री सरस्वती पुष्पाञ्जलि आसन मन्त्र

नाना–रत्न–समायुक्तं कार्तस्वर–विभूषितम्।
आसनं देवि देवेशि! प्रीत्यर्थं प्रतिगृह्यताम्॥

॥ श्रीसरस्वती–देव्यै आसनार्थे पञ्च–पुष्पाणि समर्पयामि॥

मन्त्र अर्थ – हे देवताओं की ईश्वरी! विविध प्रकार के रत्नों से युक्त स्वर्ण-सज्जित आसन को प्रसन्नता हेतु ग्रहण करें।

॥ भगवती सरस्वती के आसन के लिये मैं पाँच पुष्प अर्पित करता हूँ ॥

नवोपचार-पूजनम्

तदुपरान्त ‘चन्दन-अक्षत-पुष्प-धूप-दीप-नैवेद्य’ से भगवती सरस्वती का पूजन निम्नलिखित मन्त्रों द्वारा करें।

श्री सरस्वती नव उपचार पूजन मन्त्र

ॐ श्रीसरस्वती–देव्यै नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
ॐ श्रीसरस्वती–देव्यै नमः शिरसि अर्घ्यं समर्पयामि।
ॐ श्रीसरस्वती–देव्यै नमः गन्धाक्षतान् समर्पयामि।
ॐ श्रीसरस्वती–देव्यै नमः पुष्पं समर्पयामि।
ॐ श्रीसरस्वती–देव्यै नमः धूपम् आघ्रापयामि।
ॐ श्रीसरस्वती–देव्यै नमः दीपं दर्शयामि।
ॐ श्रीसरस्वती–देव्यै नमः नैवेद्यं निवेदयामि।
ॐ श्रीसरस्वती–देव्यै नमः आचमनीयं समर्पयामि।
ॐ श्रीसरस्वती–देव्यै नमः ताम्बूलं समर्पयामि।

मन्त्र अर्थ – तत्पश्चात् ‘चन्दन-अक्षत-पुष्प-धूप-दीप-नैवेद्य’ द्वारा निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुये भगवती काली का पूजन करें।

पूजन-समर्पणम्

इस प्रकार पूजन करने के उपरान्त बायें हाथ में गन्ध, अक्षत, पुष्प लेकर दाहिने हाथ द्वारा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये ‘बही-खाते’ या ‘पुस्तकों’ आदि पर छोड़े।

श्री सरस्वती पूजा समर्पण मन्त्र

ॐ श्रीसरस्वत्यै नमः। अनेन पूजनेन श्रीसरस्वती देवी प्रीयताम्। नमो नमः।

मन्त्र अर्थ – श्रीसरस्वती को नमस्कार। इस पूजन से श्रीसरस्वती देवी प्रसन्न हों, उन्हें बारम्बार नमस्कार।

श्री कुबेर पूजा विधि

आपके पास श्री कुबेर की मूर्ति है तो वह पूजा में उपयोग की जा सकती है। यदि आपके पास कुबेर की मूर्ति नहीं है तो उसके स्थान पर आप तिजोरी या आभूषणों के बक्से को श्री कुबेर के रूप में मानिये तथा उसकी पूजा कीजिये। तिजोरी, बक्से आदि की पूजा से पूर्व सिन्दूर से स्वस्तिक-चिह्न बनाना चाहिये तथा उस पर ‘मौली’ बाँधना चाहिये।

ध्यानम्

सर्व प्रथम निम्नलिखित मन्त्र द्वारा श्री कुबेर का ध्यान करें।

श्री कुबेर ध्यान मन्त्र

मनुज–बाह्य–विमान–स्थितम्,
गरुड–रत्न–निभं निधि–नायकम्।
शिव–सखं मुकुटादि–विभूषितम्,
वर–गदे दधतं भजे तुन्दिलम्॥

मन्त्र अर्थ – मानव-स्वरूप विमान पर विराजमान, श्रेष्ठ गरुड़ के समान सभी निधियों के स्वामी, भगवान् शिव के मित्र, मुकुट आदि से सुशोभित और हाथों में वर-मुद्रा एवं गदा धारण करने वाले भव्य श्रीकुबेर की मैं वन्दना करता हूँ।

आवाहनम्

भगवान् श्रीकुबेर का ध्यान करने के उपरान्त तिजोरी-बक्से आदि के सम्मुख आवाहन-मुद्रा प्रदर्शित करते हुये निम्नलिखित मन्त्र द्वारा उनका आवाहन करें।

श्री कुबेर आवाहन मन्त्र

आवाहयामि देव! त्वामिहायाहि कृपां कुरु।
कोशं वर्द्धय नित्यं त्वं परि–रक्ष सुरेश्वर॥

॥श्रीकुबेर–देवम् आवाहयामि॥

मन्त्र अर्थ – हे देव, सुरेश्वर! मैं आपका आवाहन करता हूँ। आप यहाँ पधारें, कृपा करें। सदा मेरे भण्डार की वृद्धि करें और रक्षा करें।

॥ मैं श्रीकुबेर देव का आवाहन करता हूँ ॥

पुष्पाञ्जलि-आसनम्

आवाहन करने के उपरान्त निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये श्रीकुबेर देव के आसन के लिये पाँच पुष्प अञ्जलि में लेकर अपने सामने, तिजोरी-बक्से आदि के निकट छोड़े।

श्री कुबेर पुष्पाञ्जलि आसन मन्त्र

नाना–रत्न–समायुक्तं कार्त्त–स्वर–विभूषितम्।
आसनं देव–देवेश! प्रीत्यर्थं प्रतिगृह्यताम्॥

॥श्रीकुबेर–देवाय आसनार्थे पञ्च–पुष्पाणि समर्पयामि॥

मन्त्र अर्थ – हे देवताओं के ईश्वर! विविध प्रकार के रत्न से युक्त स्वर्ण-सज्जित आसन को प्रसन्नता हेतु ग्रहण करें।

॥ भगवान् श्रीकुबेर के आसन के लिये मैं पाँच पुष्प अर्पित करता हूँ ॥

नवोपचार-पूजनम्

तदुपरान्त चन्दन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य द्वारा भगवान् श्रीकुबेर का पूजन निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुये करें।

श्री कुबेर नव उपचार पूजन मन्त्र

ॐ श्रीकुबेराय नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
ॐ श्रीकुबेराय नमः शिरसि अर्घ्यं समर्पयामि।
ॐ श्रीकुबेराय नमः गन्धाक्षतान् समर्पयामि।
ॐ श्रीकुबेराय नमः पुष्पं समर्पयामि।
ॐ श्रीकुबेराय नमः धूपम् आघ्रापयामि।
ॐ श्रीकुबेराय नमः दीपं दर्शयामि।
ॐ श्रीकुबेराय नमः नैवेद्यं निवेदयामि।
ॐ श्रीकुबेराय नमः आचमनीयं समर्पयामि।
ॐ श्रीकुबेराय नमः ताम्बूलं समर्पयामि।

मन्त्र अर्थ – तत्पश्चात् ‘चन्दन-अक्षत-पुष्प-धूप-दीप-नैवेद्य’ द्वारा निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुये भगवती काली का पूजन करें।

पूजन-समर्पणम्

इस प्रकार पूजन करने के पश्चात् बायें हाथ में गन्ध, अक्षत, पुष्प लेकर दाहिने हाथ द्वारा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुये ‘तिजोरी-बक्से’ आदि पर छोड़े।

श्री कुबेर पूजा समर्पण मन्त्र

ॐ श्रीकुबेराय नमः।
अनेन पूजनेन श्रीधनाध्यक्षः श्रीकुबेरः प्रीयताम्।
नमो नमः।

मन्त्र अर्थ – श्रीकुबेर को नमस्कार! इस पूजन से श्रीकुबेर भगवान् प्रसन्न हों, उन्हें बारम्बार नमस्कार।

॥ इसी प्रकार श्री-कुबेर पूजा समाप्त हुयी ॥

दीपमालिका पूजा विधि

सर्वप्रथम पारिवारिक परम्परा के अनुसार पूज्य पितरों तथा कुल-देवता, ग्राम-नगर-देवताओं के मध्य में सरसों के तेल का एक बड़ा दीपक तथा उसके चारों ओर ग्यारह-इक्कीस-इक्यावन अथवा अधिक छोटे दीपक, एक परात अर्थात् बड़ी थाली में रखकर सजा लें। तदुपरान्त दीप-देव का ध्यान करें।

ध्यानम्

दीप-देव का ध्यान करते हुये पूजा आरम्भ करनी चाहिये। दीप-देव का ध्यान करते समय निम्नलिखित मन्त्र का जाप करना चाहिये।

दीपमालिका ध्यान मन्त्र

भो दीप! ब्रह्मरूपस्त्वं ह्यन्धकार–विनाशकः।
गृहाण मया कृतां पूजाम् ओजस्तेजः प्रवर्धय॥

मन्त्र अर्थ – हे दीप! आप अन्धकार का नाश करने वाले ब्रह्म-स्वरूप हैं। मेरे द्वारा की गयी पूजा को ग्रहण करें तथा ओज तथा तेज की वृद्धि करें।

प्रार्थना

दीप-देव की पूजा के उपरान्त, निम्नलिखित मन्त्र से प्रार्थना करते हुये दीपमालिका को नमस्कार करें।

दीपमालिका प्रार्थना मन्त्र

शुभं करोतु कल्याणमारोग्यं सुख–सम्पदम्।
मम बुद्धि–प्रकाशं च दीप–ज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
शुभं भवतु कल्याणमारोग्यं पुष्टि–वर्धनम्।
आत्म–तत्त्व–प्रबोधाय दीप–ज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
दीपावलिर्मया दत्ता गृहाण त्वं सुरेश्वरि!
अनेन दीप–दानेन ज्ञान–दृष्टि–प्रदा भव॥

मन्त्र अर्थ – दीप-ज्योति शुभ करे, कल्याण करे, आरोग्य करे, सुख-सम्पदा प्रदान करे, मेरी बुद्धि को प्रकाशित करे, दीप-ज्योति-स्वरूपा आप भगवती को नमस्कार। शुभ कल्याण एवं आरोग्य हो तथा पुष्टि की वृद्धि हो। आत्म-तत्त्व को प्रबुद्ध करने वाली दीप-ज्योति, आपको नमस्कार। हे देवेश्वरि! मेरे द्वारा अर्पित दीप-पँक्ति को आप स्वीकार करें तथा इस दीप-दान से आप मुझे ज्ञान-दृष्टि प्रदान करें।

उक्त प्रकार से दीपमालिका का पूजन करने के पश्चात् दीपमालिका को नमस्कार करें एवं पञ्च-पात्र से दाहिने हाथ में जल लेकर दीप-मालिका के चारों ओर घुमाते हुये भूमि पर छिड़क दें।

तत्पश्चात् धान का लावा, लाई, ईख, नारियल, फल एवं मिष्टान्न आदि उपलब्ध वस्तुयें अर्पित करें। कलश, भगवान गणेश एवं भगवती लक्ष्मी की नवीन मूर्तियों, तिजोरी, बही-खातों तथा दीपमालिका के सम्मुख धान का लावा छिड़क दें।

पुष्पाञ्जलि-आसनम्

दीप-देव के ध्यान के पश्चात् दीप-देव का पूजन करते हुये निम्नलिखित मन्त्र का जाप करना चाहिये तथा दोनों हाथों की हथेलियों जोड़कर अञ्जलि में तीन पुष्प लेकर दीपक के समक्ष अर्पित कर देना चाहिये।

दीपमालिका पुष्पाञ्जलिः मन्त्र

ॐ दीप–वृक्षाय नमः।

मन्त्र अर्थ – दीप-वृक्ष को नमस्कार है।

विसर्जन विधि

विसर्जन एक संस्कृत शब्द है, जो अन्तिम अनुष्ठान एवं देवता के प्रस्थान के लिये सम्मानपूर्वक अनुरोध करने के कार्य को सन्दर्भित करता है।

किसी भी पूजा के आरम्भ में, पूजा के उद्देश्य से सर्वप्रथम मूर्ति में पीठासीन देवता का आवाहन किया जाता है। पूजा के अन्त में, पीठासीन देवता से मूर्ति से प्रस्थान करने का अनुरोध किया जाता है।

प्रणाम

उपर्युक्त प्रकार पूजा करने के पश्चात्, पूजा में उपस्थित सभी बालक-पुरुष-स्त्रियाँ अपने हाथों में पुष्प लेकर भगवान गणेश, महालक्ष्मी, महाकाली, महासरस्वती तथा कुबेर जी की जय-जयकार करें तथा छोटे से बड़े के क्रम में उनके सम्मुख पुष्प अर्पित करते हुये दण्डवत् प्रणाम करें।

दीपमालिका ध्यान मन्त्र

भो दीप! ब्रह्मरूपस्त्वं ह्यन्धकार–विनाशकः।
गृहाण मया कृतां पूजाम् ओजस्तेजः प्रवर्धय॥

मन्त्र अर्थ – हे दीप! आप अन्धकार का नाश करने वाले ब्रह्म-स्वरूप हैं। मेरे द्वारा की गयी पूजा को ग्रहण करें तथा ओज तथा तेज की वृद्धि करें।

विसर्जनम्

दण्डवत् प्रणाम करने के पश्चात् पूजा करने वाला व्यक्ति दाहिने हाथ में अक्षत, पुष्प लेकर विसर्जन हेतु निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें –

दीवाली विसर्जन मन्त्र

यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्।
इष्ट–काम–समृद्घ्यर्थं पुनरागमनाय च॥

मन्त्र अर्थ – सभी देवगण मेरे द्वारा की गयी पूजा को स्वीकार कर अभीष्ट कामनाओं की समृद्धि के लिये पुनः आगमन हेतु यहाँ से विदा हों।

समापन

उक्त मन्त्र का उच्चारण करने के पश्चात् पूजा करने वाला व्यक्ति अक्षत-पुष्प देवताओं के सम्मुख छोड़कर उन्हें प्रणाम करे। पूजा में सम्मिलित सभी लोग पूजा करने वाले को प्रणाम करें, दक्षिणा दें तथा प्रसाद ग्रहण करें।

दीपमालिका पुष्पाञ्जलिः मन्त्र

ॐ दीप–वृक्षाय नमः।

मन्त्र अर्थ – दीप-वृक्ष को नमस्कार है।

Diwali Pooja in Brief

इस दिन विशेष रूप से मां लक्ष्मी, सरस्वती माता, काली माता, भगवान गणेश और कुबेर देवता की पूजा की जाती है। दिवाली पूजन के शुभ मुहूर्त में विधि विधान दिवाली का पूजन करें और घर में दिए जलाएं। चलिए जान लेते हैं दिवाली पूजन में क्या-क्या सामग्री लगेगी और पूजा की विधि क्या है।

दिवाली पूजन सामग्री (Diwali Pooja Samagri List)

• लकड़ी की चौकी

• फूल

• फल

• कपूर

• गेहूं

• लाल कपड़ा

• लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति

• कुमकुम

• हल्दी की गांठ

• दूर्वा घास

• जनेऊ

• खील बताशे

• चांदी के सिक्के और कलावा

• रोली

• पान

• बाती

• सुपारी

• लोंग

• अगरबत्ती

• धूप

• दीपक

• घी

• गंगाजल

• माचिस

• पंचामृत

दिवाली पूजा विधि (Diwali Puja Vidhi At Home In Hindi)

• जिस स्थान पर लक्ष्मी-गणेश पूजन करना है उस स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर लें।

• फिर वहां एक साफ चौकी रखें और उस पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछा लें।

• इस चौकी पर लक्ष्मी-गणेश, सरस्वती माता, कुबेर देवता और राम दरबार की मूर्ति स्थापित करें। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि लक्ष्मी जी प्रतिमा गणेश जी के दाहिनी तरफ रखनी है।

• सभी मूर्तियों पर गंगाजल छिड़कें। फिर हाथ में लाल या पीले रंग का फूल लेकर ऊँ गं गणपतये नम: मंत्र से गणेश जी का ध्यान करें।

• फिर गणेश जी के माथे पर तिलक लगाएं और उन्हें दूर्वा अर्पित करें।

• फिर माता लक्ष्मी का विधि विधान पूजन करें। माता लक्ष्मी को लाल सिंदूर का तिलक लगाएं और उनके बीज मंत्र “ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभ्यो नमः॥“ का जाप करें।

• इसी तरह आप कुबेर देवता, राम दरबार और मां सरस्वती का पूजन भी कर लें।

• अंत में माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की आरती करें।

• इसके बाद घर के कोने-कोने में दीपक जलाकर रख दें। इसके अलावा दो बड़े दीपक घर के मंदिर में रखें। जिसमें घी का दीपक मां लक्ष्मी के लिए होता है और सरसो के तेल से भरा दीपक पूर्वजों के नाम से रखा जाता है।

• घी का बड़ा दीपक पूरी रात जलाकर रखें।