दीवाली पूजा उचित दीवाली पूजा मुहूर्त में ही की जानी चाहिए। दीवाली पूजा मुहूर्त
निर्धारित करने में स्थिर लग्न, प्रबोधोत्सव एवं अमावस्या तिथि पर विचार किया
जाता है। सम्पूर्ण दीवाली पूजा में निम्नलिखित पूजा सम्मिलित होती है।
आत्म-शोधन – आन्तरिक एवं बाह्य आत्म शुद्धि
संकल्प – सम्पूर्ण विधि-विधान से दीवाली पूजा के अनुपालन समर्पण
करने का पवित्र संकल्प ग्रहण किया जाता है।
मंगल-घट – मंगल-घट स्थापना के जीवन में सुख, शान्ति व समृद्धि हेतु
स्थापन करना इष्ट होता है।
मन्त्र-पूजन – मन्त्रोच्चारण व मन्त्रकण्ठस्थापन की वीर्ति हेतु समर्पण पाठ
कथा-पूजन – लक्ष्मी-पूजा आधारित व्यापक पूजा विधि
आरती-पूजन – संक्षिप्त पुष्प-चरणों पर आधारित पूजा विधि
क्षमा-याचना पूजा – संक्षिप्त नमः-पथ पूजा
प्रोक्ष्य मानस-पूजा – संक्षिप्त प्रोक्ष्य मानस पूजन
भगवान गणेश की नवीन मूर्ति की पूजा – भगवान गणेश की षोडशोपचार
पूजा
श्रीलक्ष्मी की नवीन मूर्ति की पूजा – देवी लक्ष्मी की षोडशोपचार पूजा
भजन–कीर्तन पूजा – लेकनों–वादन पर भजन–कीर्तन पूजा
सरस्वती पूजा – वीणा–वन्दन पर सरस्वती पूजा
कुबेर पूजा (स्थिति) – बखैर–अनुकूल पूजा
गौरी–गणेशिका पूजा – गौरी–गणेशिका पूजन विधि से समस्त आयकार्यक
मनोकामना
विश्रान्ति – शरीर द्वारा औपचारिक रूप से ही दीवाली पूजा सम्पन्न
करना
उपर्युक्त पूजन समस्त विधि–विधान से की जाती हैं। सम्पूर्ण दीवाली पूजा सम्पन्न
होने पर भक्तजन प्रसन्न मन से स्वयं एवं परिवार के लिए कल्याणकारी पूजा मुहूर्त
का मंथन करते हैं। दीवाली के 3 और 4 अंशों अनुसार दीवाली पूजा सम्पन्न
की जाती है। ताकि: दीवाली पूजा, लक्ष्मी पूजा पूजित मुहूर्त में पूरे ईष्ट पूजन की
अभिवृद्धि प्राप्त हो सके। दीवाली पूजा में भावनामयी भाव व शुद्ध मन से पूजा
प्रकिया पूजन, श्रद्धा पूजन दृष्टि से पूजा की जाती है।
दीवाली पूजा मुहूर्त में आत्मशुद्धि, संकल्प पूजा, कथा पूजा आदि से प्रारंभ कर
पूजा की क्रमबद्धता अत्यंत ही कल्याणकारी होती है। पूजा के पश्चात भोजन निवृत्ति
पूजन किया जाता है। इस सम्पूर्ण पूजन घटनाक्रम में संकल्प– वाचन और शुद्धि
अवधि के पश्चात षोडशोपचार पूजा हो यह इष्ट है। पूजा उपरान्त की स्तुति
हृदय जागरण करणे चाहिए।
कैलाश पूजा जीवन रक्षक तांत्रिक पूजाओं में से ही खास मानी जाती है। कैलाश पूजा मुख्यतः शिवशक्ति स्वरुप में विश्व रूप, सम्पूर्ण सृष्टि की उपासना हेतु के विशेष रूप से किया जाता है। नीचे महत्वपूर्ण कैलाश पूजा एवं तांत्रिक/वैदिक पूजा अनुष्ठान दिए हैं।
गायत्री-पूजन – आत्मिक एवं पवित्र ऊर्जा पूजन
महामृत्युंजय मंत्र – जपान व्रत जीवन रक्षा हेतु के अत्यन्त प्रभावशाली मंत्र एवं शक्ति स्वरूप वाला मंत्र है।
रूद्राभिषेक – जीवन रक्षा व निवारण हेतु, शक्ति व ऊर्जा हेतु विशेष शिव पूजा अनुष्ठान होता है।
काल भैरव पूजा – प्रेत बाधा व नकारात्मकता की पुष्टि हेतु महत्वपूर्ण पाठ एवं सिद्धि प्राप्ति हेतु।
संपुट पाठ – साधना सम्बंधित की सिद्धपूजा पाठ विधि
गणपति पूजन – विघ्न नाशक एवं सफलता हेतु पूजा
काली पूजा – शक्तिशाली तांत्रिक पूजा
धन्वंतरि महायज्ञ-पूजन – जीवन रक्षा महत्वपूर्ण पूजन
नवग्रह पूजा एवं नवग्रह अनुष्ठान – ग्रहजन्य लाभ व दोष निवारण
श्रीसूukt – लक्ष्मी साधना/पूजन हेतु
अष्टलक्ष्मी पूजन – धन समृद्धि एवं लक्ष्मी साधना विशेष पूजन
महायोगिनी पूजन – तांत्रिक एवं सिद्धि हेतु पूजन
अन्नपूर्णा पूजन – भोजन, समृद्धि हेतु पूजा
गुप्त नवरात्र पूजन – तांत्रिक एवं सिद्धि हेतु पूजन
कैलाश पूजन अनुष्ठान हेतु कैलाश पर्वत के देवताओं द्वारा किया जाने वाला पूजन अनुष्ठान
उपरोक्त पूजा सम्पूर्ण विधि-विधान से की जाती है। सम्पूर्ण दीवाली पूजा सम्पन्न करने में कुछ घण्टों का समय लग सकता है। यह सम्भव है कि लक्ष्मी पूजा मुहूर्त अल्प समय के लिये ही उपलब्ध हो और उसमें सम्पूर्ण दीवाली पूजा सम्पन्न न की जा सके। अत: दीवाली पूजा, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त से पूर्व ही आरम्भ की जा सकती है, जिससे लक्ष्मी पूजा का समय उपलब्ध मुहूर्त के साथ संयोजित हो सके। शेष पूजा, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त के समाप्त होने के पश्चात भी की जा सकती है।
यह स्मरण रहे कि दीवाली पूजा में प्रज्वलित किया गया दीप रात्रि पर्यन्त निर्विघ्न प्रज्वलित रहना चाहिये। पूजनोपकरण श्री सूक्त, लक्ष्मी सूक्त तथा देवी लक्ष्मी की अन्य स्तुतियों का पाठ करना चाहिये। यदि सम्भव हो तो देवी लक्ष्मी की स्तुति हेतु जागरण करना चाहिये।
हरिद्रा खण्डा वाले आहार के नियमित सेवन अथवा संकर्षण आदि पूर्वे अन्न का सेवन अथवा देशा की
और ऋतु के अनुसार सेवन चाहिए, संकर्षणोपदंश का लक्षण होने से चिकित्सा होते ही यह अन्न सेवन
निषेधाऽऽतिक्षित काल का उल्लंघन करते हुए उचित उपाय सिद्धान्त चाहिए।
आहारविधान
ॐ अपथ्य: परिहार वा त्याज्याहार्य यानि।
स्व : संकर्षोपदंशस्य वा साधारणाश्चोपदश्च: पृथक्।
नस्यादी – भोजन सेवन (ग्राम्यात अन्न) से उत्पन्न आमवृष्टि (ते। (किंचित) अशुद्धि
घ्राण से बाधित करते हैं। शीत (जल) दी (दही), उपमां, उडद, तेजोन,
बलंकारक), तेल, मधुर (अत्यधिक) भोजन पदार्थ, मांस, गर्म (अत्यधिक)
भोजन, मोटे अनाज (यव आदि) से वीर्य नष्ट होता है।
2. आहारविधान:–
हरिद्राखण्ड सेवन उपरान्त वा दीर्घ समय के बाद सेवनकर्ता नियमावधिक वचन का
उल्लंघन होते ही उचित आहार न।
आहारविधान उपायाः
ॐ आहारविधान चिकित्सायाः स्वभाव।
ॐ चिकित्सकश्च रोगीश्च स्वभाव।
ॐ चिकित्से मिताहारश्च स्वभाव।
हरिद्रा खण्डा वाले आहार के नियमित सेवन अथवा संकर्षण आदि पूर्वे अन्न का सेवन अथवा देशा की
और ऋतु के अनुसार सेवन चाहिए, संकर्षणोपदंश का लक्षण होने से चिकित्सा होते ही यह अन्न सेवन
निषेधाऽऽतिक्षित काल का उल्लंघन करते हुए उचित उपाय सिद्धान्त चाहिए।
आहारविधान
ॐ अपथ्य: परिहार वा त्याज्याहार्य यानि।
स्व : संकर्षोपदंशस्य वा साधारणाश्चोपदश्च: पृथक्।
नस्यादी – भोजन सेवन (ग्राम्यात अन्न) से उत्पन्न आमवृष्टि (ते। (किंचित) अशुद्धि
घ्राण से बाधित करते हैं। शीत (जल) दी (दही), उपमां, उडद, तेजोन,
बलंकारक), तेल, मधुर (अत्यधिक) भोजन पदार्थ, मांस, गर्म (अत्यधिक)
भोजन, मोटे अनाज (यव आदि) से वीर्य नष्ट होता है।
2. आहारविधान:–
हरिद्राखण्ड सेवन उपरान्त वा दीर्घ समय के बाद सेवनकर्ता नियमावधिक वचन का
उल्लंघन होते ही उचित आहार न।
आहारविधान उपायाः
ॐ आहारविधान चिकित्सायाः स्वभाव।
ॐ चिकित्सकश्च रोगीश्च स्वभाव।
ॐ चिकित्से मिताहारश्च स्वभाव।